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बदलते परिदृश्य में सवर्णों को आरक्षण की जरूरत :बी. बी. रंजन

पुष्यमित्र शुंग एक मात्र ब्राह्मण राजा थे। राजपूत तो महज क्षत्रप थे। भारत में सत्ता सनातन पिछड़ों की रही है। मौर्यवंश, गुप्तवंश का ही शासन रहा है। सत्ता की भूख से पनपी फूट से देश में विदेशी अल्पसंख्यकों ने पाँच सौ वर्षों तक राज किया और कालांतर में अंग्रेज भी।….. Read more




आज का मोहम्मद बिन तुगलक

nitish-furious india बिहार में शासन और भ्रष्टाचार की चाहे जितनी भी बातें हवा में चलती रहे, सामाजिक न्याय के चाहे जितने भी नगाड़े बजते रहे, उभरता बिहार का चाहे जितना भी जुमला छनता रहे, सरकार बेवश है, तंत्र फेल्योर है, अफसरशाही निरंकुश है. नीतीश कुमार बेशक कई प्रयोगों में असफल रहे है. मोहम्मद बिन तुगलक की दिल्ली से दौलताबाद और दौलताबाद से दिल्ली के  मार्ग का कुमार ने जाने-अनजाने अनुसरण किया है. कभी बीडीओ और सीओ के पदों को एकल पद में बदला गया, फिर स्थिति यथावत बना दी गयी. …….. Read more…..



बी. बी. रंजन की कलम से – बिहार में असहिष्णुता

बिहार में जातीय और धार्मिक राजनीति के लम्बरदारों की असहिष्णुता खतरनाक है। बिहार में प्रताड़ना की राजनीति करनेवाले लोग असहिष्णुता के खिलाफ भी बोलते हैं। सम्प्रदायवाद की राजनीति करनेवाले धर्मनिरपेक्षता का ढिढोरा पीटते हैं। जाति भेद को कायम रखने वाले सामाजिक न्याय की बात करते हैं। अगड़ा-पिछड़ा की दूकान चलानेवाले न्याय के साथ विकास की ठेकेदारी करते हैं। सवर्णों के खिलाफ आग उगलनेवाले असहिष्णुता की बात करते हैं। घोटालेबाज खजाना के रक्षक होते हैं। कानून तोड़नेवाले कानून के रखवाले हैं।….Read more………


हनुमान की तरह शक्तिशाली जनता अपनी ताकत भूल गयी है

 

आजादी के 68 वर्षों बाद भी हम सकारात्मक निर्णय से परहेज करते हैं और चुनावोपरान्त पछताते हैंंैं। हर बार हम एक बड़े भ्रष्टाचारी को हराने के लिये दूसरे महाबली भ्रष्टाचारी से समझौता कर लेते हैंं, योग्य प्रत्याशी पर गंभीर नहीं होते। नकारात्मक मिशन की परिणति सकारात्मक नहीं होती। मतदाता लोकतंत्र के प्रहरी भी हैं, मालिक भी हैं। संभवतः हनुमान की तरह शक्तिशाली जनता अपनी ताकत भूल गयी है। हमें लोकतंत्र के खरीददारों को बाहर का रास्ता दिखाना होगा। ….Read More……



अध्यक्ष पद से बर्खातगी

या अरूण की
बल्ले—बल्ले

कोईरी मतदाताओं के द्वारा पूरी तरह नकारे गये उपेन्द्र कुशवाहा की राजनैतिक पकड़ इन दिनों हासिये पर चली गयी है। बिहार विधानसभा चुनाव में कोईरी मतदाताओं ने महागठबंधन को अपनाया और उपेन्द्र कुशवाहा को पूरी तरह खारिज कर दिया। जातीय राजनीति से उभरनेवाले कुशवाहा की राजनैतिक हैसियत अब सिमट गयी है। कुर्था विधानसभा में रालोसपा की करारी हार ने उपेन्द्र कुशवाहा के अंदर वोट ट्रांसफर न कराने की क्षमता का खुलासा कर दिया था। कुर्था सीट पर उम्मीदवारी अरूण कुमार ने तय की थी। कुमार रामजतन सिन्हा जैसे कद्दावर नेता के पक्ष में गोलबंद भूमिहारों को तोड़ने में सफल रहे थे, लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा की खमता पर सवालिया निशान पैदा हो गया। भाजपा के सहारे उनकी नैया अब अधिक दिनों तक नहीं चलनेवाली है। राजनीति के मंजे खिलाड़ी अरूण कुमार इस बात को भली— भाँति समझते हैं।…….Read more…..

 



सवर्णों की आवाज बनने से डरते हैं सवर्ण नेताः बी. बी. रंजन

सवर्ण मतों के दावेदारों का सच

न तू जमीं के लिए, न आसमाँ के लिए

तेरी जिन्दगी है सिर्फ दास्ताँ के लिए

सुषमा स्वराज की मानें तो जिसने रामायण नहीं पढ़ी वह रिश्तों के धर्म को नहीं जानता और जिसने महाभारत नहीं पढ़ी वह मन के मर्म को नहीं जानता।

मेरी मानें तो संस्कारहीन संविधान का महत्व नहीं जानते। सत्तासीन रावण भी था, ताकतवर हिरण्यकशिपु भी था। वनवास तो राम ने भी झेला था। पूरी जिन्दगी सीता को कष्ट ही मिला था। लेकिन हम रावण और हिण्यकशिपु की सत्ता का गुणगान तो नहीं करते।      ——-Read More………

 



कोबरा झुकता है तो डँसता है: बी. बी. रंजन 

    आज वीपी सिंह के आरक्षण के मसले को झटकनेवाले लोग अपनी कामयाबी पर इठलाते हैं। सवर्णों को विदेशी कहा गया, ‘भूरा बाल’ , ‘मुठ्ठी भर लोग’  और पन्द्रह बनाम पचासी की घृणित राजनीति कर आपसी भाईचारा बिगाड़ा गया। घृणित राजनीति में जनाधार तलाशे गये। इन्हें मंचों से गालियाँ दीं गयीं और जयचन्दों ने तालियाँ बजायीं। सवर्णों को खुलेआम प्रेस कॉफ्रेन्स में औकात में रहने की चेतावनी दी गयी। सवर्ण पाँच सौ छिद्रों वाले गंजी और बनियान पहनते हैं, लेकिन उन्हें सामंत कहा जाता है। सवर्ण मनरेगा के मजदूरों से बदतर जिन्दगी जीते हैं, लेकिन उन्हें जमीन्दार कहा जाता है।   

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Source : Internet



मतों के सौदागरों को देशभक्त बनना होगा: बी. बी. रंजन

धारा ३७० की वापसी, तथाकथिक सेकुलरों के आत्ममंथन

और रोजगार की व्यवस्था में ही कश्मीरी शांति के बीज छिपे हैं.  

 

श्मीर विवाद १९४७ से चला आ रहा है. भारत सम्पूर्ण कश्मीर पर अपना दावा जताते रहा है, लेकिन महज ४३ प्रतिशत भाग पर ही भारत का कब्ज़ा रहा है. सियाचिन, जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख में भारत का शासन है. पाकिस्तान ३७ प्रतिशत भाग पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखता है. आज़ाद कश्मीर, उत्तरी क्षेत्र और गिलगित पाकिस्तान के कब्जे में है. शेष २० प्रतिशत भाग पर चीन का कब्ज़ा है. देमचोक,  शक्स्गाम घाटी और अक्साई में चीन का कब्ज़ा है. अक्साई पर चीन ने १९६२ के भारत-चीन युद्ध में कब्ज़ा कर लिया. 

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उत्तरप्रदेश : पिछड़ी जातियों की राजनीति की बिसात के बीच फिसलती सपा

 

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