हनुमान की तरह शक्तिशाली जनता अपनी ताकत भूल गयी है

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हमें लोकतंत्र के खरीददारों को बाहर का रास्ता दिखाना होगा 

 

आजादी के 68 वर्षों बाद भी हम सकारात्मक निर्णय से परहेज करते हैं और चुनावोपरान्त पछताते हैंंैं। हर बार हम एक बड़े भ्रष्टाचारी को हराने के लिये दूसरे महाबली भ्रष्टाचारी से समझौता कर लेते हैंं, योग्य प्रत्याशी पर गंभीर नहीं होते। नकारात्मक मिशन की परिणति सकारात्मक नहीं होती। मतदाता लोकतंत्र के प्रहरी भी हैं, मालिक भी हैं। संभवतः हनुमान की तरह शक्तिशाली जनता अपनी ताकत भूल गयी है। हमें लोकतंत्र के खरीददारों को बाहर का रास्ता दिखाना होगा।
पुराने प्रतिनिधियों के कार्यों के सम्यक् विश्लेषण की जरूरत है। तलवार की पैनी धार का नारा देनेवालों को भोथरी धार ने क्षेत्र बदलने को विवश कर दिया है। तलवार गुलामी, खूनी संघर्ष और राजतंत्र की याद कराता है। लोकतंत्र में तलवार अप्रासांगिक है। अब शांति, विकास और न्याय का दौर है। बगैर निर्माण, पूरी राशि डकारनेवाला चरित्र आज क्षेत्र बदलने को मजबूर है। कार्यों के भौतिक सत्यापन, ग्रामीणों के बयान और दस्तावेजों का अवलोकन जरूरी है। क्षेत्र और दल बदलने से चाल, चरित्र और चेहरा में बदलाव नहीं होता। अवसरवादिता प्रकृति है, लोलुपता जीवनपर्यन्त कमजोरी है, क्षेत्र परिवर्तन और दलबदल असफलता का प्रमाण है।
अवसर बीतने पर जनसमस्याओं को उठाना और अधिकारियों से उलझ जाना छवि चमकाने की कोशिश हो सकती हैै। जरूरत सकारात्मक परिणाम की है, सार्थक परिणति की है। उलझन, बहस और विवाद कार्यों को मंजिल नहीं देते। प्रतिनिधि के अंदर सफेदपोश अधिकारियों को बेनकाब करने की ताकत होनी चाहिये, भ्रष्टाचार उजागर करने का कॉन्सेप्ट होना चाहियेे। कलम में इतनी ताकत होनी चाहिये कि लोकसेवक कार्य निष्पादन को विवश हो जाये। दिनकर के शब्दों में,
दलबदल सत्तालोलुपता की प्रामाणिकता है, अविश्वासपूर्ण चरित्र का सत्यापन है, सिद्धान्तविहीन स्वार्थ की पराकाष्ठा है। दलबदल के साथ ही मौसम वैज्ञानिकों के बोल भी बदल जाते हैं। कभी काँग्रेस के वफादार होनेवाले लोग विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के दफ्तरों पर दिखते हैें, क्योंकि पार्टियाँ अब खर्च देती हैं। अतिमहत्वाकांक्षी लोग विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हो जाते हैं। आसन्न चुनाव में आपके समक्ष ऐसे चरित्रवानों की एक लम्बी फेहरिस्त होगी। आपको सर्तकता के साथ एक वफादार सेवक चुनना होगा जिसके पास जीने का अपना आधार हो, जो जुझारू हो लेकिन झगड़ालू नहीं। जिन्होंने राजनीति को अपनी जीविका बना लिया, ठेकेदारी का जरिया बना लिया, जिन्होंने जनसेवा की आड़ में ठगी की दूकान चला ली, हथियार तस्करी का कारोबार संभाल लिया, वैसे दोहरे चरित्र से परहेज की जरूरत है।
राजस्व कर्मचारी दलाल रखता है। पशुचिकित्सक फरार रहता है। आत्महत्या को विवश किसान निजी चिकित्सकों का मुँहताज रहता है। स्वास्थ्य उपकेन्द्रों के ताले नहीं खुलते, ग्रामीण झोलाछाप चिकित्सकों पर निर्भर हैंं। फसल क्षतिपूर्ति और डीजल अनुदान हिचकोले लेता है। चुनाव में शराब और पैसे की जरूरत बतानेवाले पैरोकारों की कतारें नहीं टूटतीं। बुनियादी सुविधाओं के पक्ष में तलवार की तेज धार’ और सरकार के सिपहसालारों की आवाज नहीं उठी। जनराशि का हिसाब प्रस्तुत करनेवाले प्रतिनिधि नहीं मिले।
मयखानों के पथिक दूसरे के पैसों से मदिरापान को लेकर प्रसन्न हैं। उन्हें अपने स्वास्थ्य में गिरावट की चिन्ता नहीं होती। उन्हें खरांजा के अंदर छह ईंच की बालू बिछाई नहीं चाहिये। उन्हें पक्की ढलाई नहीं चाहिये। उन्हें ठेसीली रास्तों पर एतराज नहीं। शराब अपराध को जन्म देती है, अच्छे—बुरे की सोच को लकवा मार जाता है। हर मोर्चे पर निराश लोग अंततः क्षणिक लाभ के लिये अपना ईमान, अपनी जमीर बेच देते हैं। जब तक गरीबी है, अशिक्षा है, बेकारी है तब तक भ्रष्टों की राजनीति है। हमारे भाई लोभी नहीं हैं, भ्रष्ट नहीं हैं, मजबूर हैं। उनकी गरीबी लाभ उठा लिया जाता है, उन्हें बहका दिया गया है, उनकी बेबसी भ्रष्टों को अच्छी लगती है, उनकी बेचारगी उन्हें उर्वर राजनैतिक जमीन देती है। उन्हें चुनावी काल में बंधुआ मजदूर बना लिया जाता है। उन्हें जागृत करने की जरूरत है। भ्रष्ट राजनीतिज्ञ ‘यूज एण्ड थ्रो’ की राजनीति करते हैं। चुनावोपरान्त ठेकेदारों से साँठगाँठ का दौर आता है। भटके प्रचारकों की उपयोगिता समाप्त हो जाती है। आज राजनीति कारोबार है और कारोबारियों के जेहन में लाभांश है, शोषण है, निष्ठुरता है। फिर, साढ़े चार वर्षों के बाद भटके प्रचारकों की प्रासांगिकता बनती है। राजशाही चलानेवाली कई क्षेत्रीय पार्टियों के प्रवक्ताओं की तरह उन्हें फिर घिसे—पिटे जुमलों के साथ चौक—चौराहों पर लगा दिया जाता है।
आज हमारा प्रतिनिधि रेल में छेड़खानी करने लगा है, युवतियों को बहकाकर भगाने का आरोपी बनने लगा है, युवतियों की इज्जत की खरीद करता है, सुरा और सुंदरी की जरूरत पर बेहयापूर्ण बयान देता है, हत्या की राजनीति करने की खुलेआम घोषणा करता है। सड़कों पर एके—47 लहराने लगे हैं। अपराध समस्या बन चुकी है। अब मदिरा के प्रमाद में बर्बाद होते घरों को बचाने की जरूरत है। लीवर और किडनी की बीमारी के वितरकों केे तिरस्कार की जरूरत है। पाँच रूपये की बिस्किट से हमारा बच्चा प्रसन्न होता है, हमारी मातायें और बहनें आगन्तुकों का स्वागत करतीं हैं। बीस रूपये की हरी सब्जी से हमारे पूरे घर को खनिज लवण मिलते हैं। बीस रूपये के फल से हमारे परिवार के सदस्यों को कैंसररोधी विटामिन प्राप्त होते हैं। सात रूपये में दो सौ एमएल दूध मय्यसर हो जाये तो कुपोषण दूर हो जाता है। लेकिन शराब का सेवन पूरा घर को गमगीन कर जाता है, घर का विकास अवरूद्ध हो जाता है, बच्चे कुंठित हो जाते हैं, पत्नी हतप्रभ हो जाती है, मातायें जन्म देकर प्रायश्चित करतीं हैं, गरीबी और निकम्मेपन से परिवार विक्षिप्त हो जाता है, पारिवारिक कलह जड़ें जमातीं हैं और आत्महत्या की प्रवृति पनपती है। क्षणिक सुख का अंत कितना हृदयविदारक होता है, इसके भावी परिणाम कितने भयावह होते हैं। यह आपके सपनों के सौदागर का वास्तविक चरित्र—चित्रण है, यह तलवार की धार से लबरेज होने के दावेदारों का कड़वा सच है। अंधकारमय रणनीति में उजाला की संभावना कहाँ, बहशीपन में मानवता कहाँ, लालच में विकास कहाँ, भ्रष्ट बुनियाद में पारदर्शिता की संभावना कहाँ? वहाँ तो ठगी है, स्वार्थ है, लूट है, गंदगी है, अपराध है, व्यभिचार है, अय्यासी है, अनैतिकता है। अंतिम परिणति आपकी स्थायी दुदर्शा है। इतिहास गवाह है। आजादी के 69 वर्ष होने को है।
आज अनुदान पर चलनेवाला जेएनयू देशद्रोही गतिविधियों के लिये सुर्ख़ियों में है। लेकिन हमारे राजनेताओं को वहाँ भी पॉलिटिकल स्कोेर दिखता है। जातिवादी जुमलों से भारतवासियों के बीच अनावश्क लकीरें खींचतीं है, लेकिन हमारे स्वार्थी राजनेताओं को मीडिया माइलेज मिलता है। लोकतंत्र की खरीद से देश कमजोर होता है, लेकिन हमारे अयोग्य राजनीतिज्ञों को राजनैतिक हनक मिलती है। प्रशासनिक हस्तक्षेप से न्याय बाधित होता है, लेकिन हमारे जुल्मी राजनीतिज्ञों को अपराधियों का संरक्षण मिलता है। शराब हमारे भाइयों की सात पीढ़ियाँ बर्बाद करती हैं, लेकिन लुटेरे राजनीतिज्ञों को आर्थिक सबलता मिलती है। इन शोषित लोगों को मुख्यधारा में लाने की जरूरत है। परिवर्तन होनेवाला है, सोच बदलनेवाली है।
बंद स्वास्थ्य केन्द्रों की याद तब आती है जब हमारे परिवार का सदस्य रात्रि में बीमार हो जाता है। जब लगभग साढ़े चार लाख रूपये की लागत से बननेवाला पुलिया एक दिन भी कार्य नहीं करता तो बीसियों गाँवों को बरसात में आवागमन की बाधा समझ में आती है। जब हमारे बच्चों के ऊपर जर्जर विघालय—भवन का मलवा गिरता है तो जनता प्रतिनिधियों के कागजी भवन—निर्माण के लियेे बददुयाँ देती है। जब जातीय आधार पर फंड का आवंटन होता है तो देश में गृह—युद्ध की स्थिति पनपती है। नालंदा में धान का क्रय होता है लेकिन पटना में जातीय आधार पर धान—क्रय को प्रभावित किया जाता है तो पारदर्शिता की कलाई खुलती हैं. जब यात्रा के दौरान जनप्रतिनिधि और लफंगे हमारी माँ-बहनों की आबरू पर कुदृष्टि डालते हैं तो सामाजिक न्याय और सामाजिक न्याय दिवस के झूठे प्रलाप और प्रचार की कलई खुलती है. जब हमारे घर की अस्मत को ऊँचे सब्जबाग दिखाकर आज का एमएलए उन्हें उड़ा ले जाता है तो हमें अपने निणर्य पर पछतावा होता है, सुशासन की सरकार के सच से सामना होता है. जब मेरिट घोटाले की मीडिया हलचल पर सरकार को अपनी चिरनिद्रा तोड़ने की मजबूरी सामने आती है तो हमें उभरते बिहार के दावों का सच समझ में आता है, भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की हकीकत दिखती है. पन्द्रह बनाम पचासी की राजनीति करनेवालों के पैरोकार और मंच से जातीय आधार पर गली देनेवाला तालीवादक भी सरेआम दिखता है,लेकिन उसके दल के विधायक जब दलितों, पिछड़ों और सवर्णों के घर की अस्मत से खुलेआम खिलवाड़ करता है तो उसका बडबोलेपन चुप्पी में बदल जाता है.
चुनाव आते ही एकबार फिर हथियार तस्कर, मदिरालय का पुजारी, जनसेवा की आड़ में ठेकेदारी करनेवाला गैरजिम्मेदार, संगठन का चंदा डकारनेवाला घोटालेबाज भी जनसेवक होने का दंभ भरता है। कुबेरपति भी ऊपरी तौर पर दानकर्ता की भूमिका अख्तियार करता है। लक्जरी गाड़ियों का शानी अपनी झोली और तिजोरी खोलता है। सारे एलानकर्ताओं की प्रतिबद्धता बदल जाती हैै। क्षेत्र की जनता के भारी दबाव के कारण चुनाव में उतरने की मजबूरी की कई झूठी घोषणायें होरीं हैं। दलबदलुओं को जाति की एकता की याद आती हैै। लेकिन टिकट के बंटवारे में गजीबों की यद्स्वा नहीं आती. मतों के लिए गरीब याद आतें हैं, उनकी गोलबंदी की जरूरत याद आती है, लेकिन टिकट के लिए गरीबों के कोटे से उन्हें चिराग, तेजस्वी, तेजप्रताप, मिसा, रामचंद्र पासवान, अनिल साधू, संतोष मांझी, जयवर्धन और मंटू तिवारी की याद आती है. अथार्त ऐसे लोगों की जो कुबेरपति हैं, महाअगड़ा हैं. राजनीति में खानदानी बहुरूपियों की जमात है। कई दोहरे चरित्र की पुनरावृति होती है।
दूसरी ओर निष्पक्ष, पारदर्शी, बेदाग छवि भी मैदान में होती है जिसके शरीर पर कभी अच्छे वस्त्र नजर नहीं आते। स्वाभिमानी और समर्पित लोग भी होते हैं। जनसमस्याओं को अपने बूते उठानेवाला आर्थिक समस्याओं से ग्रसित चरित्र भी सामने होता है, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलानेवाला व्यक्तित्व भी मैदान में होता है। दलाली, ठेकेदारी और अनैतिकता से दूर रहनेवाला चरित्र भी आपके समक्ष आता है। मदिरा और राशि वितरण से परहेज करनेवाला प्रत्याशी भी आपके सामने होेगा। ऐसे लोग भी आयेंगे कुकर्मों से आपका स्वाभिमान मिट जायेगा, आपकी नजरें झुक जायेंगीं। ऐसे लोग भी होंगे जिनके चयन से आप अगले पाँच वर्षों तक गर्वान्वित होंगे, आपकी नजरें नहीं झुकेंगी, आपका सिर नहीं झुकेगा।
जनता को लक्जरी गाड़ियों की सैर करनेवाले जनप्रतिनिधियों की नहीं, माफिया सरगनाओं और मदिरालय के ठेकेदारों की नहीं बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी जनसेवकों की जरूरत होती है। जनता को अहंकारी फरेबियों की नहीं बल्कि समर्पित प्रहरी की जरूरत है। जनता को हथियार तस्करों की नहीं बल्कि शांति के पुजारी की जरूरत है। जनता को लठैतों की नहीं बल्कि समाधानकर्ताओं की जरूरत है। जनता को लक्जरी गाड़ियों की सैर का हिसाब चाहिये। जनता को जनसेवा की आड़ में चलनेवाली ठेकेदारी पर स्पष्टीकरण चाहिये। नवयुवकों को पारदर्शी विकास चाहिये। आवाम को निष्पक्ष समृद्धि चाहिये। महिलाओं को शराबमुक्त समाज चाहिये।
राजनीति भी बला है? भ्रष्टाचार के पोषकों के रंग बदल जाते हैं, उनकी श्ौली बदल जाती है। वक्त पर सकारात्मक और विश्लेषणात्मक निर्णय की जरूरत है। लोकतंत्र कोे नीलामी से बचाने की जरूरत है। शराब और पैसों के वितरक प्रत्याशियों को अपनी क्षमता और जनता की समझ पर भरोसा नहीं। उन्हें शराब और पैसों पर भरोसा है। लोकतंत्र के खरीददारों का दोहरा चरित्र है। हमारी जनता गरीब है, शोषित है, साजिश की शिकार है, लेकिन स्वाभिमानी है।
पंचायत चुनाव आपके सपनों को साकार करने के लिये आता है। खुली आमसभा की बैठकों के जरिये योजना बनाने का अधिकार भारतीय संविधान ने दिया है। लेकिन बंद कमरों में बननेवाली योजनाओं के कारनामे काले होते हैं। इन थपेड़ों के पीछे आपकी चुप्पी जिम्मेदार है। अदूरदर्शिता और अनिर्णय की स्थिति में हमारे सपने मरते गये। पाश के शब्दों में, ट्टखतरनाक होता है सपनों का मर जाना।’ आसन्न पंचायत चुनाव में कर्तव्य के प्रति जिम्मेदारी और अधिकार के प्रति जागरूकता आपकी जबाबदेही है, क्योंकि अगले पाँच वर्षों की सजा आपकोेे भुगतनी है, अगले पाँच वर्षों तक सामूहिक पारितोषिक आपकोेे पाना है।

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