लालू और नीतीश ने चौपट कर दी शिक्षा: बी. बी. रंजन

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2015 में चार मंजिल इमारतों पर पुर्जा पहुँचाने के लिए स्पाइडरमैन की तरह लटके अभिभावकों की तस्वीरें, 2016 में पॉलिटिकल साइंस को प्रोडिकल साइंस कहनेवाली रूबी राय की तस्वीर और 2017 में बिहार-झारखंड के आधुनिक तानसेन अर्थात 42 वर्षीय गणेश कुमार की तस्वीर बिहार में शिक्षा के स्वरूप का परिचय करातीं हैं। 

Image result for unfair means in bihar board examination

गणेश कुमार, जिसे बिहार में 24 वर्ष का प्रमाणपत्र मिल जाता है। आईआईटी की परीक्षा में उत्तीर्ण छात्र बिहार बोर्ड की परीक्षा में अनुतीर्ण है, गणित की जगह मार्कशीट में बायोलॉजी के अंक जुड़े हुए हैं।
हर बार इन तस्वीरों के प्रकाशन के बाद कुछ अधिकारियों को हटाया गया, कुछेक स्कूल संचालकों के खिलाफ कार्रवाई हुई, कुछेक कर्मी दण्डित हुए और सरकार कर्तव्यनिष्ट होने का प्रमाण पा गयी। सुशासित सरकार का पाप गहरा है, कृत्य अक्षम्य है, नीचे से ऊपर तक के लोगों को बचाने का कुचक्र जारी है। सिर्फ टॉपर फ्रॉड नहीं है। इस गडबडी का दायरा व्यापक है। पूरी मैशीनरी सलिप्त है, खेल सुनियोजित है, उच्च अंक पानेवाले कई लोग इस गिरोह के लाभार्थी हैं। गणेश कुमार जानबूझकर नहीं, बल्कि परिस्थितियों का टॉपर है।
1990 से अर्थात् पिछले 27 वर्षों से बिहार में लगातार शिक्षा बर्बाद होता रहा है। नीतीश स्टाइल में लगभग पूरी शिक्षक ठेके पर बहाल है और शिक्षकों की गुणवत्ता खास्ताहाल है। कांग्रेस के पतन्नोमुख राज में बहाली में पैरवी का चलन आया, लालू राज में पैसों का बोलबाला हुआ और अब नीतीश राज में अनाडी लोगों को नौकरी मिल गयी, जिन्हें राजनीतिक कारणों से दण्डित नहीं किया जा सकता।
बिहार में बदहाल शिक्षा की पूरी जबाबदेही लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की है। लालू प्रसाद के शुरुआती कार्यकाल में छात्रों का पलायन 12वीं के बाद होता था, नीतीश कुमार के राज में 12वीं से पहले होता है। केरल बोर्ड में छात्रों की अपार भीड़ है और गुणवत्ता ऐसी कि वहां सीबीएसई स्कूलों की संख्या काफी कम है। दूसरी ओर बिहार के सरकारी प्राथमिक स्कूलों में प्रायः अब वैसे ही बच्चे बचे हैं , जिनके लिए दोपहर का खाना एक समस्या है। माध्यमिक स्कूलों उन बच्चों की तादाद है, जिनके अभिभावक प्राइवेट स्कूल की फीस अदा नहीं कर सकते। दोनों ही हाल में सरकारी विद्यालयों में गरीब और वंचित समाज के बच्चे हैं। सामाजिक न्याय की सरकार शिक्षा माफिया के भारी भुगतान तले साष्टांग है। राजनीतिक लाभ के समक्ष सामाजिक न्याय बकवास है।

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