राजनीति में भ्रष्टाचार की पहली शिक्षा मतदाताओं से मिलती है

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  तू ये माने कि न माने, लोग मानेंगे जरूर…………

राजनीति में भ्रष्टाचार की पहली शिक्षा मतदाताओं से मिलती है

 

And miles to go before I sleep………

 

मैं हतप्रभ थी जब गरीबी झेलती जनता चंद दिनों के लिये चंद रूपयों पर प्रलोभित हो रही थी। मैं आश्चर्यचकित थी जब भ्रष्टाचार पर बोलनेवाले बैठकबाज चुनावी माहौल में वसूली कर रहे थे, बड़बोले पुरानी बेकार की रंजिश का ताना मार रहे थे, प्रचार में शरीक लोगों पर चुप्पी साधने का दबाव बनाया जा रहा था। पटना बैठे आका जिला परिषद् में चुनावी जीत की रणनीति बना रहे थे। मेरे अंदर विराजमान आत्मनिर्णय की क्षमता से इन्हें डर लगता है, क्योंकि मंजूषा की जीत दलालों की हार है। पाँच वोट कन्वर्ट कराने में असफल लोग जिला परिषद्, विधानसभा और संसदीय चुनावों मेें जिताने और हराने की ठेकेदारी लेते हैं। अच्छे कार्यों की जमात बनने में देर होती है। मैं चलती रहूँगी, कारवाँ बनता रहेगा. कभी तो सवेरा आयेगा, पगडंडियों के पथिक को समझना होगा.

 

MANJUSHA RANJAN

MANJUSHA RANJAN

ईमानदारी की स्थापना और विकासात्मक अभिरूचि के साथ राजनीति में पदार्पण का हश्र आत्मघाती होता है। कदम—कदम पर यह शिक्षा मतदाताओं की ओर से मिलती है। सर्वश्रेष्ठ के तगमा से नवाजा जाना क्या एकमत के लिये काफी नहीं। मैं आवाक् थी जब हर कदम पर लोग राजनैतिक जीत के लिये पैसों और दारू के भरपूर उपयोग की नसीहत दे रहे थे। मैं हतप्रभ थी जब गरीबी झेलती जनता चंद दिनों के लिये चंद रूपये पर प्रलोभित हो रही थी। मैं आश्चर्यचकित थी जब भ्रष्टाचार पर बोलनेवाले बैठकबाज चुनावी माहौल में वसूली कर रहे थे, सफेदपोश की कमीजें कालीं हो रहीं थीं, बड़बोले पुरानी बेकार की रंजिश का ताना मार रहे थे, प्रचार अभियान में शरीक लोगों पर चुप्पी साधने का दबाव बनाया जा रहा था। मैं बलात्कारियों और दलालों की प्रचार गाड़ियों पर विराजमान सफेदपोश तथाकथित सिद्धान्तविहीन वामपंथियों को देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ थी। पारदर्शिता दर्शानेवाला व्यक्तित्व भ्रष्टाचारी की गाड़ियों पर विराजमान था। पटना बैठे आका जिला परिषद् में चुनावी जीत की रणनीति बना रहे थे। कभी उपप्रमुख और प्रमुख की कुर्सी की जंग में पराजय देख चुके आकाओं की जिला परिषद् के चुनाव में बढ़ती सक्रियता को मैंने गंभीरता से लिया है।

बाजार में कई स्थानों पर छटुओं की कई जमातें बैठती हैं। अपने गाँव की काली करतूतों के उजागर होने के बाद अब इनकी बैठकी यही लगती है। इन्हें हवाबाजी की जिम्मेदारी दी जाती है। कुल मिलाकर गलत करनेवाले दलालों की एक लॉबी है। मेरी स्पष्टवादिता से इन्हें मिचली आती है। मेरे अंदर विराजमान आत्मनिर्णय की क्षमता से इन्हें डर लगता है, क्योंकि मंजूषा की जीत दलालों की हार है।

चुनाव में 22 मतों पर सिमटनेवाले लोग जिला परिषद् की सीट को समाज के खाते में डालने की जिम्मेदारी निभाते हैं। गाँव की ईमानदार प्रतिभा को बर्बाद करने का ठेकेदार सामाजिक चेतना का ढोंगी स्वरूप दर्शाता है। पाँच वोट कन्वर्ट कराने में असफल लोग जिला परिषद्, विधानसभा और संसदीय चुनावों मेें जिताने और हराने की ठेकेदारी लेते हैं। अपने गाँव को बर्बाद करने की नीति चलानेवाले लोग क्षेत्र को सही दिशा देने की जबाबदेही दर्शाते हैं। अजीब विडम्बना है। दिन भर प्रचार में घुमनेवाला द्विअर्थी वाचाल, दोहरा चरित्र दर्शाने में परहेज नहीं करता। चंद रूपयों के लिये मुँह बाये शख्स चुनाव आयोग की मतगणना से पहले जीत और हार का सर्टिफिकेट बाँटता फिरता है। चंद रूपयों के लिये चाटुकारिता करनेवाले आदेशपालों की भीड़ लग जाती है।

money -furious india

पाँच सौ रूपयों के लिये पीछे पड़ने वाले सवर्ण लोगों की जमात भी मैंने देखी। छह सौ मात्र की वसूली को छह हजार कहनेवाले वसूलीकर्ताओं का सच भी मैंने देखा। मुँह में राम बगल में छूरी के साक्षात् अवतार के दर्शन भी होते रहे। निःस्वार्थ समर्पित मतदाताओं की कतारें भी देखी, उनकी व्यथा और आत्मनिर्णय की दमदार कोशिश की विफलता भी देखी, उनकी संशयात्मक और ‘पहले आप’ की लखनवी अंदाज की शिथिलता की परिणति भी देखी।

कुल मिलाकर लोकतंत्र में फरेबी लोगों की सक्रियता का साक्षात् दर्शन हुआ, वसूलीकर्ताओं से मित्रता बढ़ाने का ऑफर मिलता रहा, पैसों के लिये अपनों के बेगाने होने का दौर जारी रहा, वादाखिलाफी के कटु अनुभव मिलते रहे और हर बार ऐसा लगा कि लोकतंत्र भ्रष्टाचारियों की रखैल है, राजनीति फरेबियों की बिसात है। फरेबियों और वसूलीकर्ताओं की जमात में कोई उम्र बंधन नहीं है। हमाम में सक्रिय तमाम लोग नंगे हैं। जो ईमानदार हैं उनकी चुप्पी बरकरार है। यही चुप्पी लोकतंत्र के क्रेताओं की सक्रियता के लिये जिम्मेदार है। भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम बच्चों का खेल नहीं है। घपलेबाजों से संघर्ष एक खतरनाक तप है। लेकिन नेतृत्वकर्ता एक ही होता है। अच्छे कार्यों की जमात बनने में देर होती है। मैं चलती रहूँगी, कारवाँ बनता रहेगा। कभी तो सवेरा आयेगा, पगडंडियों के पथिक को समझना होगा।

पालीगंज वंशवादी राजनीतिज्ञों का सुरक्षित चारागाह बन गया है. राजनीति पैसोंवालों के इर्द-गिर्द घूमने  लगी है. जनसेवा की भावना अंतिम साँसे गिन रहा है. लोकतंत्र हिचकोले ले रहा है. पालीगंज विधानसभा क्षेत्र मॉडेलविहीन फरेबी राजनीतिज्ञों का आशियाना बन गया है. ऐसे लोगों ने राजनीति का स्वरुप बिगाड़ दिया है जिनके पास जनता से कहने को कुछ नहीं है. वैसे लोगों की सक्रियता दिखने लगी है जिनके पास विकास का कोई कांसेप्ट नहीं है. चुनावी जीत के लिए हथकंडा इस्तेमाल  करनेवाले  राजनीतिज्ञ होने का दंभ भरने लगे हैं. अपनी वास्तविक योग्यता अथार्त डिग्री या डिप्लोमा छिपाने और उसे बढाकर पेश करनेवालों की कलई खुलने लगी है. चुनावी जीत के लिए चालबाजी और अनैतिकता पर जनता की सजगता निहायत जरूरी है. 

वंशवादी राजनीति करनेवाले लोगों ने समानता और जनकल्याण का ढिढोरा खूब पीटा, लेकिन गरीबी को जीवित रखा, पिछड़ापन को बरकरार रखा और इसी बूते अपनी गैरविकासवादी राजनीति को जीवित रखने में सफलता पाई. पालीगंज की राजनीति कभी रामलखन सिंह के इर्द-गिर्द घुमती है, कभी कन्हाई सिंह पर केन्द्रित रही. राजनीति का कन्हाई एरा समाप्त हो गया है. रामलखन एरा की चमक बरक़रार है. यूरिया घोटाला, कोलकाता की अशोभनीय खबरें, मंत्रालय की चाहत में दलबदल के आरोप और दिल्ली से सीधे पालीगंज की राजनीति में धनबली, जातीय भावना और दलीय रूझान के योगदान हैं.

कई राजनैतिक दलों ने पैतीस वर्षों से पालीगंज के लोगों को पालीगंज की जनता के नेतृत्व के काबिल नहीं समझा. पालीगंज में सकारात्मक राजनीति के क्षेत्र में एक शून्यता झलकती है. पाली भाषा की गरिमा को बरक़रार रखनेवाले और बुद्ध के प्रभावक्षेत्र के रूप में विकसित पालीगंज में आज प्रलोभन और मिथक की राजनीति पर गहरी छाप है. नशेबाजों की दोस्ती की तर्ज पर ही मतों के ठेकेदारों की जमात तुरंत बनती है. वसूली के कई रूप हैं, कई अन्दाज हैं, कई पैमाने हैं. ठगी के कई स्वरुप है.  कहीं मकान के एक छोटे हिस्से का प्लास्टर कराया जाता है, कहीं पांच लीटर डीजल पर ही काम चल जाता है, कहीं चापाकल की मांग है, कहीं तीन हजार की मामूली ठेकेदारी ली जाती है, कहीं हवावाजी के लिए साप्ताहिक पांच सौ रूपये की परंपरा है, कही हवाई चप्पल भर से बात बन जाती है, कोई कपड़ा बनबाता है, कोई बेटी की शादी में जेवरात बनबाने के लिए सुखियों में आता है. कहीं साज-सामान की खरीद होती है, कहीं शराब पर ही पटा लिया जाता है. कोई पांच सौ रूपये पर वोट नीलाम करता है, कोई एक हजार की कीमत लेता है, कोई वोटों की ठेकेदारी के लिए थोड़ी मोटी राशी डकारता है अथार्त पैसों का वितारणकर्ता बनकर  दो-चार दिनों की चलती दर्शाने को बेचैन रहता है. नामांकन और रैली में लोगों की जमात जुटाने के भी ठेके लिए जाते है. क्षेत्र भ्रमण के लिए भी कई लोगों ने अपनी फीस निर्धारित कर रखी है. लोकतंत्र के नीलामीकर्ताओं के कई स्वरुप हैं. चंद रूपयों पर दो माह की चापलूसी करनेवाले आदेशापालों की स्थिति पटना के हनुमान मंदिर में बैठे भिक्षुओं से बदतर है. मंदिर के भिखारी तथ्य नहीं छिपाते, लोकतंत्र को गिरवी नहीं रखते, देश को नीलम करने की साजिस में शरीक नहीं होते, आम लोगों की विकास राशि को भ्रष्टाचारियों के हाथों गिरवी रखने के आरोपी नहीं होते. उनकी जिन्दगी खुली किताब है, उनकी बेचारगी देश के छली राजनेताओं की छलपूर्ण विकासवादी नीतियों की रिपोर्ट है, फरेबी राजनीतिज्ञों की कपट पर मुहर है.

अफसोस इस बात का है की चंद रूपयों पर चाकरी की हैसियत में आ चुके दलालों को अभी भी अपनी गिरती दशा का एहसास नहीं है. सवर्ण परिवार के लोग भी पुड़ी और जलेबी पर खुश होने लगे है. बीए पास युवक अपनी बेरोजगारी के लिए सरकार की नीतियों को नहीं कोसता, तंत्र की विफलता पर नहीं बिफरता, अपने नौनिहालों के सुखद भविष्य के लिए सिस्टम में बदलाव की मांग नहीं करता. अलबत्ता फेल्योर तत्र के गुनाहगारों के साथ कदमताल बैठा लेता है, पांच वर्षों पर मिलनेवाले दो माह की चुनावी टन्डेली पर इठलाता है, संतोष कर लेता है. इस  टन्डेली की परम्परा को रोकना होगा. मिशन कठिन है, संघर्ष लम्बा खिचेगा, क्योंकि राजनीतिज्ञों ने जागरूकता को पनपने से रोकने की नियत से जनता को गरीब, पिछड़ा और बेकार रखा है. रोजगारप्राप्त लोग  टन्डेली नहीं करते.  

बहरहाल सन् 2020 में विधानसभा चुनाव है। मुझे मिशन विधानसभा 2020 पर बहुत कुछ करना है, पालीगंज को 35 वर्षों की गुलामी से मुक्त कराना है। राजनीति के मापदण्ड को स्थापित करना है, प्रजातन्त्र की सच्चे अर्थों में स्थापना के लिए कड़ी मिहनत करनी है, लम्बा संघर्ष करना है. 

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