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मॉलों की कूपन पॉलिटिक्स से कंगाल होते लोग

लुटेरे मॉलों के कूपनों की गिरफ्त में आये तो सामान्य जन कंगाल हो जायेंगे। आम जनों के साथ इनकी राजनीतिक चालबाजी गजब की है। सामान्य जनों को कंगाल और पूँजीपतियों को मालामाल बनाने की सोची समझी रणनीति को व्यापार की भाषा में कूपन पॉलिटिक्स कहिये जनाब।

तीन हजार रुपये की खरीद पर कभी तीन हजार का कूपन आपको वी 2 देता है तो कभी ट्रेंड्स का पांच हजार की खरीद पर मिलनेवाले तीन हजार के कूपन का मौसम आ जाता है। दो-चार दिन शेष रहने की स्थिति में 2999 रुपये की खरीद पर 2500 रुपये के कूपन थमा दिए जाते हैं। मानों इन मॉलों ने खरीददारों को अपनी दौलत खैरात में देने का मन बना लिया है, लेकिन घर जाकर हिसाब जोड़ने पर पता चलता है कि उन्हें पूंजीपतियों की चालाकी ने कंगाल बनाने का विकल्प बाजार में उतार दिया है।

बन्दा अपनी कमाई का कुछ हिस्सा मुश्किल से बचाकर मॉल में जाने की योजना बनाते हैं। मानलिया कि उनका बजट 1500 रुपये तक की खरीद का है। मॉल के रेट और बच्चों की पसंद से कपड़े 2200 या 2500 रुपये तक पहुँच गए। बिल काउंटर पर महज आठ हजार की पगार पर कार्यरत शख्त आपको तीन हजार की खरीद पर तीन हजार के कूपन का प्रलोभन देगा। आप लोभ में पड़ेंगे और 1500 रुपये का बजट तीन हजार रुपये में तब्दील हो गया।

अब बच्चे और बीबी खुश हैं, लेकिन इसी माह में दूसरी खरीददारी तक ही कूपन मान्य है। अन्य शर्तें भी लागू हैं। एक हजार की खरीद पर 500 रुपये का एक कूपन इनकैश होगा। आपके पास तीन हजार के कूपन हैं तो छह हजार की खरीद कीजिये। तीन हजार का भुगतान करें और तीन हजार के कूपन इनकैश होंगे। इसप्रकार 1500 रुपये खर्च की अनुमति देता आपका बजट छह हजार पर रुकता है। फिर घर चलाने को 4500 रुपये कहाँ से आयेंगे।

मॉल प्रबंधन को पता है कि कूपन वाले बंदों की दुबारे मॉल से खरीददारी की गारंटी नहीं। इसलिए पहली खरीद में भी उनका भारी मुनाफा निर्धारित है और दूसरी खरीद में उनका लाभ सुनिश्चित है। अर्थात कूपन की दौर में मालों के मूल्य इतने निर्धारित होते हैं कि कूपन की राशि उसे प्रभावित ही न करे। मसला साफ है। ग्राहकों को प्रभावित करना है, अनिच्छा के बावजूद उनकी जेब से रुपये निकालने हैं, गैर जरूरी सामग्रियों की खरीद करवाने की स्थिति पैदा करनी है और मॉल का सेल बढ़ाना है। एक वाक्य में कहें तो सामान्य जनों को कंगाल और पूँजीपतियों को मालामाल बनाने की सोची समझी रणनीति को व्यापार की भाषा में कूपन पॉलिटिक्स कहिये जनाब। आज देश के अधिकांश मॉलों में राजनीतिज्ञों की बेनामी पूँजी लगी है।

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