मुलायम की चाल: लाचार शिवपाल —-***बी. बी. रंजन.

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मुख से जरा नकाब हटाओ मेरे हुजूर ………


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अब मुलायम और लालू के मुख से नकाब हटनेवाला है. शिवपाल की हर चाल को कुछ दिनों तक रोककर मुहिम को आउटडेटेड करने की ठेकेदारी कर रहे हैं मुलायम. 2019 के संसदीय चुनाव से पहले बिहार में महागठबंधन कहाँ टूटनेवाला है.


Image result for laloo nitish tussleमुकदमों और आरोपों से परेशान चारा कांड के आरोपी और सजायाफ्ता लालू प्रसाद ने बिहार सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लालू ने कहा कि सरकार अपेक्षा के अनुरूप कार्य नहीं कर रही है। दूसरी और यूपी में सपा, बसपा और कांग्रेस में तोड़फोड़ की राजनीति में भाजपा सफल होती दिख रही थी। छह जुलाई को शिवपाल ने अपने समर्थकों की बैठक बुलाई है और उसी दिन समाजवादी सेक्युलर मोर्चा नामक नई पार्टी का एलान करनेवाले हैं। शिवपाल के साथ लगभग 25 विधायक हैं, जो मुलायम की अध्यक्ष बनने की हामी के साथ सेक्युलर मोर्चा में जा सकते हैं। अभी तक किसी-न-किसी बहाने सपा और अखिलेश को बचानेवाले मुलायम की अब अग्नि-परीक्षा है।
25 विधायकों के टूटने पर सपा सदन में विपक्ष की भूमिका गँवा देगी और अगले साल राज्यसभा में सपा को एक भी सीट नहीं मिलेगी। कांग्रेस और बसपा में संभावित तोड़फोड़ के बाद विपक्ष के लिए राज्यसभा की दसों सीटें खतरे में पद सकती है और भाजपा को एक सीट अधिक मिल जायेगी। शिवपाल के लिए उनके समर्थक सपा में महत्वपूर्ण भूमिका चाहते हैं और शिवपाल सिंह मुलायम सिंह को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते हैं। रामगोपाल यादव के खिलाफ कार्रवाई के प्रति भी शिवपाल का अड़ियल मूड है। अखिलेश शिवपाल की इन दोनों मांगों को पूरा नहीं कर सकते।
समाजवादी सेक्युलर मोर्चा भाजपा के एलान और मुलायम को कमान से भाजपा को एक और लाभ होगा। इसके बाद मुलायम 27 अगस्त को लालू की प्रायोजित रैली में शिरकत नहीं करेंगे और भाजपा के खिलाफ विपक्षियों की गोलबंदी का प्रयास विफल हो जाएगा। 
लेकिन मुलायम की चाल से उत्तर प्रदेश में शिवपाल यादव का समाजवादी सेकुलर मोर्चा लटक गया है। उन्होंने अप्रैल में ही इसे बनाने की पहल की थी और मुलायम सिंह को अध्यक्ष बनने के लिए तैयार भी कर लिया था, लेकिन उनकी योजना टल गई। अब छह जुलाई को भी मोर्चा के औपचारिक गठन का मसला एक बार फिर टल गया है और अब सितम्बर में कोई तारीख तय होने की बात हो रही है।
शिवपाल यादव के करीबी नेताओं का मानना है कि अब मामला हाथ से निकल गया है। विधानसभा चुनाव के तत्काल बाद या शिवपाल और आजम खां को दरकिनार कर रामगोविंद चौधरी को विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद शिवपाल के द्वारा नए दल का ऐलान ज्यादा प्रभावी होता। हर बार शिवपाल के फैसले को लटकाकर अखिलेश के हाथों में पार्टी की कमान सुरक्षित करने के लिए मुलायम यादव पर अब उंगलियाँ उठने लगीं हैं।
शिवपाल भी मुलायम की चाल समझ चुके हैं, लेकिन बार-बार मुलायम का चेहरा सामने लाकर वे अखिलेश को तीन माह के बाद अध्यक्ष बनाने के उनके वादों को याद करा रहे हैं। अगले कुछ दिनों में सपा में होनेवाले सांगठनिक चुनाव में अखिलेश एक बार फिर अध्यक्ष बनेंगे और मुलायम की चाल से शिवपाल लाचार रहेंगे। 

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