राजनीती

महाराष्ट्र का नया सवेरा सुनहरा नहीं है

                        – बी बी रंजन

बातूनी राजनीति का लगातार सूर्यास्त हो रहा है, लेकिन महाराष्ट्र का नया सवेरा सुनहरा, टिकाऊ और कारगर नहीं दिखता। दरअसल बुनियाद स्वार्थी हो, भ्रष्टाचारी औऱ दलबदलू किंग मेकर हो तो परिणाम और गठबंधन सरकार की आयु का आकलन भी सहज है। तिनके की तरह तीन से पाँच भागों में बिखरता कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना अलाइंस भाजपा की जल्दबाजी और गलत निर्णयों के कारण ज्यादा एकजुट हुआ।

इस घटना और हरियाणा-महाराष्ट्र के निर्णयों ने यह समझा दिया कि विपक्षी खेमा के नेताओं के जेहन से ईडी, सीबीआई, सीवीसी,आयकर का भय खत्म हो चुका है। दूसरी बात भी सामने आई है। विवादों से घिरे नेताओं को जनता धड़ल्ले से अपना समर्थन देती है। तीसरा तत्व भी है। हिन्दूत्व का सबसे बड़ा किरदार भाजपा से टूट चुका है। एक अति महत्वपूर्ण तथ्य को मानें तो पाक, हिन्दूत्व, 370 का नशा जनमानस में स्थायित्व नहीं पा रहा। उसे देश की तरक्की, रोजगार और यथार्थ की भूख भी है। नमो के खाली तरकस से बुद्धिजीवी तबका नाराज हो चला है।

महाराष्ट्र की सियासत के घिनौने और नाटकीय अंदाज ने बतला दिया कि हिन्दूत्व कमजोर हुआ है और उसका प्रमुख किरदार शिवसेना अब नरम पड़ गई है। भाजपा कभी शिवसेना के कट्टर हिंदूवादी अभियानों के पीछे चलती थी। बाल ठाकरे ने कभी वाजपेयी-आडवाणी के दरवाजे पर दस्तक नहीं दी। अलबत्ता इस जोड़ी ने मुंबई में उनसे कई मुलाकातें कीं। बाबरी मस्जिद विध्वंश की जिम्मेदारी लेने को भाजपा विचारती रही, लेकिन शिवसेना ने अबिलम्ब इसकी जिम्मेदारी ले ली। शिवसेना कभी भी भाजपा की तरह इस मसले पर रक्षात्मक नहीं हुई, समझौतावादी नहीं दिखी।

बेशक भारतीय राजनीति पर नमो-शाह की पकड़ ढीली हुई है। राज्यों की सत्ता उनसे लगातार फिसलती जा रही है। बुद्धिजीवी तबका विकल्पहीनता की हालत में भी भारत की दुर्दशा और भावी संकट को देखते हुए नमो के खालीपन से खासा नाराज हो चला है। यह नाराजगी गाँवों तक पहुँचने लगी है, लेकिन दूसरी ओर शरद पवार का चाल, चरित्र और चेहरा भी बदसूरत पर्दे पर लगातार चलता रहा है। वह राजनीति में नैतिक मूल्यों के ह्रास के पथिक रहे हैं। उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की राजनीति की है। घपलों, घोटालों और सत्ता की हर स्वार्थी चाल में उन्हें माहिर माना गया। उनकी सियासी चाल ने अंततः भाजपा की स्वार्थी व अनैतिक सत्तालोलुपता को न सिर्फ बेनकाब किया है, बल्कि आधुनिक चाणक्य के तगमों से विभूषित नमो-शाह गश खाकर गिर पड़े हैं।

संवैधानिक संस्थाओं की शक्तियों के दुरुपयोग की तमाम धमकियों और उदाहरणों को धत्ता बताकर शरद पवार ने बहरहाल नरेंद्र मोदी और अमित शाह को चारो खाने चित्त कर यह साबित कर दिया है कि भारत की राजनीति में सियासत के धुरंधर खिलाड़ियों की फेहरिस्त लम्बी है। नमो-शाह को अभी भी कई चालें समझनीं होंगीं।

महाराष्ट्र का नया गठबंधन परेशानियों के दौर से गुजरता रहेगा। समय-समय पर ताकझांक चलती रहेगी और सत्ता का पतन हर वक्त सम्भव दिखेगा। यह कैसा लोकतंत है, जनकल्याण के प्रति कैसा समर्पण है, जनसेवा का कौन-सा स्वरूप है? सत्ता-संघर्ष का नँगा नाच तो वाकई लाजबाब है।

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