मतों के सौदागरों को देशभक्त बनना होगा: बी. बी. रंजन

NEWS 0 Comment

धारा ३७० की वापसी, पारदर्शी सघन  अभियान,  तथाकथिक सेकुलरों के आत्ममंथन और रोजगार की व्यवस्था में ही कश्मीरी शांति के बीज छिपे हैं.  

कश्मीर विवाद १९४७ से चला आ रहा है. भारत सम्पूर्ण कश्मीर पर अपना दावा जताते रहा है, लेकिन महज ४३ प्रतिशत भाग पर ही भारत का कब्ज़ा रहा है. सियाचिन, जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख में भारत का शासन है. पाकिस्तान ३७ प्रतिशत भाग पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखता है. आज़ाद कश्मीर, उत्तरी क्षेत्र और गिलगित पाकिस्तान के कब्जे में है. शेष २० प्रतिशत भाग पर चीन का कब्ज़ा है. देमचोक,  शक्स्गाम घाटी और अक्साई में चीन का कब्ज़ा है. अक्साई पर चीन ने १९६२ के भारत-चीन युद्ध में कब्ज़ा कर लिया. 
कश्मीर घाटी में ९५ प्रतिशत मुस्लिम और महज ४ प्रतिशत हिन्दू हैं. जम्मू में ६६ प्रतिशत हिन्दू, ४ प्रतिशत बौद्ध और ३० प्रतिशत मुस्लिम हैं. लद्दाख में ४६ प्रतिशत मुस्लिम, ५० प्रतिशत हिन्दू और ३ प्रतिशत बौद्ध हैं. गिलगित में ९९ प्तैत्शत और आजाद कश्मीर में १०० प्रतिशत मुस्लिम आबादी है.
१९४७ में कश्मीर में मुस्लिम आबादी ७७ प्रतिशत थी जबकि हिन्दू २० प्रतिशत और बौद्ध एवं सिक्ख ३ प्रतिशत थे. लेकिन मुस्लिम बेहद गरीब थे और उनकी स्थिति एक मजदूर की थी. सन १९३० तक कोई भी मुस्लिम प्रतिनिधि नहीं था. 
कश्मीर में १९७० तक लोकतंत्र का विकास कम हुआ था. वहां १९८८ तक कई बदलाव लाये गए और इसका विरोध होता रहा. कश्मीर का १९८७ का विधानसभा चुनाव भी काफी विनाशकारी रहा और कई विधायकों  ने हथियारबंद विद्रोही गिरोह बना लिए.
आल पार्टीज हुर्रियत कांफ्रेंस, हरकत उल जिहाद उल इस्लाम, लश्कर-ए- तयबा, जैश-ए-मोहम्मद, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट, हरकत-उल- मुजाहिद्दीन, हिजबुल मुजाहिद्दीन और अल बद्र जैसे आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं. अमानुल्लाह खान, हाफिज मोहम्मद सईद मौलाना मसूद अख्तर, सईद शहाबुद्दीन, फज्रूल रहमान खलील, फारूख कश्मीरी, अरफिन भाई, बख्त ज़मीन  जैसे आतंकवादी नेताओं की सक्रियता है.  
जम्मू और लद्दाख में भारत के समर्थकों की संख्या है, कश्मीर में ७४ से ९५ प्रतिशत पाकिस्तान समर्थक मुस्लिम हैं. हालाँकि २६ वर्षों के इतिहास में २०१४ के चुनाव में सर्वाधिक वोटर्स मतदान में शरीक हुए. यह भागीदारी स्थानीय बिजली और भोजन के मसाले से प्रभावित था.
जम्मू-कश्मीर धारा ३७० के तहत कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा और भारत का उस पर सीमित अधिकार समस्या की जड़ है. मानवाधिकार के उल्लंघन के गंभीर आरोप भी आते रहे हैं. राज्य के ४७ फीसदी युओअक बेरोजगार हैं और २.५ लाख लोगों के पास कोई काम नहीं है. कश्मीर की यह स्थति राज्य में आतंकवादियों को उर्वर जमीन प्रदान करती है. बेरोजगारी की मार झेल रहे युवकों को आतंकवादिओं की ओर से प्रलोभन दिया जाता है और पैसे की लालच में दर-दर की ठोकर खाता युवक आतंकवादी बन जाता है. यह भी सच है कि समस्यारहित परिवारों के युवक भी आतंकवादी संगठनों से जुड़ते हैं. हाई-टेक शिक्षा ले रहे छात्र या अच्छे पदों पर आसीन लोग भी आतकवादी गतिविधियों में शरीक हो रहे हैं. ऐसे लोगों के पीछे कुछ अन्य कारण हैं. कश्मीर में जारी हिसक दौर में इन्हें आतंकवादिओं की शान-शौकत की जिन्दगी और उनकी ओर से इनके लिए भारी ऑफर भी इन्हें कम समय में सब कुछ पा लेने का अवसर प्रतीक होता है. सोशल मीडिया पर आतंकवादियों के एडिटेड विडियो जारी होते हैं. विडियो में उनकी जिन्दगी शान-शौकत की दिखाई जाती है और उनके आदेशों में तानाशाही पुट की झलक दिखाई जाती है. सोशल साइट्स पर विडियोज, फोटोज आदि महज युवाओं को लुभाने के लिए जारी किये जाते हैं. आज कम समय में दौलत, शोहरत और पॉवर युवा वर्ग  को आकर्षित करते हैं. उसमें प्रवेश के बाद की काली दुनियां से इन्हें अनजान रखा जाता है. और प्रवेश के बाद इनके अन्दर भारत के प्रति इतना नफरत पैदा भर दिया जाता है कि इनका विवेक मारा जाता है. एंट्री के बाद इनकी वापसी भी संभव नहीं. बाहर पुलिस को इनकी ताश होती है, अन्दर संगठन से गद्दारी का खामियाजा भुगतने का भय होता है. विलग होने की स्थिति में इनके परिवारवाले खतरे में पर जाते हैं. 
एक और बात है. पंजाब में जब हिंसा का दौर था तो वहां का परिवेश युवकों को आकर्षित करता था. बिहार में बेरोजगारी के दौर में जारी उग्रवादी गतिविधियों को जनाधार मिलता था. रणवीर सेना में बेराजगार या आपराधिक प्रवृति के युवाओं को शरण और सुरक्षा मिलाती थी. इन सभी संगठनों में कई शांति के पुजारी भी शामिल हो गए है, कारण माहौल ऐसा बनते जा रहा था. क्षणिक माहौल का असर युवाओं, प्रबुद्ध लोगों और सामान्य जनता पर पड़ता है. अच्छे लोग भी लगातार गलत प्रचार और आतंकवादी गतिविधियों के कारण जरी पुलिसिया दमन के खिलाफ भड़क जाते हैं. कश्मीर के युवकों की भागीदारी भी इन सारे तत्वों से प्रभावित है.
अच्छे पद पर आसीन कुशह लोगों के अन्दर अविकसित राजनैतिक इच्छाशक्ति है जिसे उभार नहीं मिला. आतंकवादियों की ओर से उन्हें अकूत पैसों के साथ ही निर्णायक भूमिका और लीडिंग रोल मिलाती है. प्रारंभिक दौर में उन्हें पर्दा के पीछे रखने की गारंटी होती है, लेकिन जब उन्हें पब्लिक डोमेन में उभार मिल जाता है तो उन लोगों को होल टाइमर बनना पड़ता है. अच्छे पदों पर आसीन लोगों की मरती राजनैतिक  इच्छाशक्ति  को उभार देने की ललक, गुमनाम रखने की गारंटी और साथ ही अकूत संपत्ति का प्रलोभन उन्हें आतंकवादी बना देता है. जुड़ाव के बाद सीधी कार्रवाई में शरीक होने का दबाव उन पर भारी पड़ता है और फिर एक लम्बे अरसे से कश्मीर के हालत पर आतंकवादियों के गलत प्रचार का असर भी तो पड़ता है. लम्बा दुष्प्रचार माइंड सेटअप को बदल देता है.  
कश्मीर में धारा ३७० के कारण हिन्दू अल्पसंख्यक हैं और उनके प्रति पूरे राज्य में असहिष्णुता का माहौल है. यह बड़ी समस्या है. उनके सामने खड़ा काउंटर फ़ोर्स बेहद कमजोर है. देश के तथाकथिक सेक्युलर  नेताओं के बोल भी कमाल के हैं. उनके अन्दर सेकुलरिज्म की कमी दिखती है. देश की सुरक्षा से जुड़े मसलों को भी तथाकथिक सेक्युलर लोग अपनी राजनीति और मत से जोड़ कर देखते है. देश की सुरक्षा पीछे छूट जाती है और उनकी स्थानीय राजनीति आगे रहती है. ऐसे लोग राज्य में सेना की ज्यादती पर बोलते हैं, सरकार की दोरंगी नीति पर बोलते हैं, लेकिन निर्दोष हिन्दुओं की सामूहिक हत्या पर नहीं बोलते, उनकी जिल्लत भरी जिन्दगी पर नहीं बोलते, उनके पलायन पर नहीं बोलते. चुनावी लाभ से प्रेरित और आपसी तनाव में राजनितिक लाभ तलाशनेवाले लोग एक दलित की हत्या और बलात्कार पर उफनने  लगते हैं, लेकिन आतंकवादियों की हत्या पर उन्हें मानवाधिकार का हनन दिखता है. ऐसे लोग बुरहान वाली को जिन्दा गिरफ्तार करने की वकालत कर रहे है, काउन्टर अटैक में भारतीय पुलिस और भारत के खुफिया तंत्र को बुरहान की पहचान करने में असफल मान रहे हैं, लेकिन उस समय यदि लोग मुठभेड़ कर रहे होते तो बात इनकी समझ में आती. गोलियों की बाछौर के बीच बुरहान की पहचान करने की नसीहत कमाल की बात हैं. बुरहान की हत्या के एक आतंकवादी  की हत्या के खिलाफ घाटी में फ़ैली हिंसा में लगभग तीस लोगों के मारे गए हैं. तथाकथिक सेकुलरों का दावा है कि भारत की रक्षा पंक्ति को बुरहान की हत्या के बाद घाटी में भड़कनेवाली संभावित हिंसा का आकलन  करना चटिये था और इसके मद्देनजर बुरहान को गिरफ्तार करना चाहिए था. गोलियों की बौछार के बीच हमारे सेना को ऐसी नसीहत न तो कहीं से देशहित में दिखता है,  न ही कहीं से और किसी से संभव दिखता है. यह नसीहत हमारी सेना के लिए आत्मघाती होगा, उनके मनोबल को तोड़ेगा.
कश्मीर में अलगाववादी जबरदस्ती भी घरों से लोगों की भर्ती लेते हैं. कई घरों के इनकार के बाद उनकी बहु-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ की खबरें भी आतीं रहीं हैं. परिवारवालों के सामने उनके घरों के महिलाओं की इज्जत लूटी गई है. 
सुरक्षा बलों के खिलाफ भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं. सेना और सुरक्षा बलों की ऐसी शिकायतें अन्य प्रदेशों से भी आतीं रहीं हैं. पारदर्शी कार्रवाई होनी चाहिए.
कश्मीर में बुरहान के पक्ष में नारे लग रहे हैं, एक बुरहान की हत्या पर हर घर से बुरहान के निकालने का आगाज हो रहा है, कश्मीर में पाकिस्तानी झंडे फहराए जा रहे हैं, आइएसआइएस का झंडा चल रहा है और विदेशी आतंकवादियों को पनाह दी जा रही है. पुरे देश में हिंसक वारदातें हो रहीं हैं, निर्दोष और निरीह लोग मारे जा रहे हैं. 
स्थिति भयावह है. मसाले पर सोनिया गाँधी और ममता बनर्जी से बात की गई है. राजनाथ सिंह अमेरिकी दौड़ा रद्द कर सोदेश लौटे गई. देश के रक्षा सचिव को विदेश दौड़ा छोड़कर भारत लौटना पड़ा है. बहरहाल प्रधानमंत्री ने विदेश दौड़ा से लौटते ही कश्मीरवासियों से शांति की अपील की है और घाटी में उनका दौड़ा भी संभावित है. संभव है, शुक्रवार तक स्थिति में सुधार हो. फिर भी, कश्मीर समस्या का स्थाई निदान आवश्यक है. मेरा मानना है की धारा ३७० की वापसी, तथाकथिक सेकुलरों के आत्ममंथन और रोजगार की व्यवस्था में ही कश्मीरी शांति के बीज छिपे हैं. कश्मीर में जबर्दस्त लेकिन सघन पारदर्शी ऑपरेशन की जरूरत है  जिसमें मतों के सौदागरों को देशभक्त बनना होगा. 

Leave a comment

Search

फ्यूरियस इण्डिया

Back to Top