बैकफुट पर लालू, समर्पण की मुद्रा में कांग्रेस और आदर्श स्थिति में नीतीश.

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संसदीय चुनाव तक अटूट है गठबंधन: 
-बी. बी. रंजन.



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अपनी तो जैसे-तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे, कट जायेगी…….. आपका क्या होगा जनाबे आली…… के ठुमके पर मन-ही मन थिरकनेवाले नीतीश कुमार के लिए राजनैतिक रूप से यह सर्वाधिक आदर्श स्थिति है: बी. बी. रंजन.


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Image result for tussle between laloo prasad and nitish1 मई को विपक्षियों की बैठक में नीतीश कुमार को संयोजक घोषित करने की जदयू की मुहिम को जबर्दस्त धक्का लगा और नीतीश कुमार बड़ी बे-आबरू होकर दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस के जरिये देशव्यापी गठबंधन की मोह से बाहर निकल गए। लालू प्रसाद की रुचि बिहार की राजनीति में है, इसलिए तेजस्वी की ताजपोशी का बखेरा भी आनेवाला है। बहरहाल दो महत्वाकांक्षी नेताओं की लड़ाई में नीतीश की सियासी चाल से लालू मिमिया गए हैं।
Image result for tussle between laloo prasad and nitishनीतीश कुमार की राजद प्रमुख के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के संकेत के बाद बेनामी संपत्ति के मामले में लालू प्रसाद सपरिवार घिर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने लालू के खिलाफ चारा घोटाले में एक जैसे सारे मामलों को अलग अलग चलाने की अनुमति दे दी है, हवाला के कारोबार से जुड़े गिरफ्तार जैन बंधुओं से उनके संबंध खोज निकाले गए हैं, काले धन को सफेद बनाने का सवाल उठा है, बेनामी संपत्ति का मसला है और आय से अधिक संपत्ति का मामला है। 

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बहरहाल नीतीश कुमार दोनों तरफ से सुरक्षित हैं। लालू  ‘एकला चलो’ की जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें अभी अपनी संतानों को राजनीतिक परिपक्वता और स्थायित्व देना है। अपने बूते महज 22 सीटों तक सिमटने का उनका राजनीतिक वजूद जगजाहिर हो चुका है। इस बार नरेन्द्र मोदी की रणनीति ने तीन तलाक के मसले पर आधे मुस्लिम मतों को तोड़ लिया। हिन्दूत्व की सनक मतदाताओं पर सवार है। नमो की हिंदूवादी चेतना के समक्ष लालू की सामाजिक चेतना बौनी हो गयी है। लालू का जनाधार अब महज एक जाति तक सिमट गया है। 
मुख्यमंत्री के पद पर नीतीश कुमार कोई रिस्क लेना नहीं चाहते। नीतीश समझ चुके हैं कि हिन्दूत्व और तीन तलाक़ से भाजपा काफी मजबूत हो चली है, सेकुलरिज्म के नारों के दिन लद गए है। उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना टूट चुका है, मोर्चा के संयोजक की संभावना भी ख़त्म हो गयी है। उन्हें भ्रष्टाचार के मसले पर लालू का साथ छोड़ने का सुअवसर भी मिल चुका है और भाजपा के बूते भावी विधानसभा चुनाव में उनकी कुर्सी भी सुरक्षित रहनेवाली है। ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ की नीतीए कुमार की पैतरेबाजी से एकबार फिर लालू सकते में हैं।
लालू प्रसाद का बैकफुट पर आना और कांग्रेस की नीतीश के आगे समर्पण की मुद्रा से नीतीश कुमार आदर्श स्थिति में है। जद यू सूत्रों की मानें तो नीतीश 2019 तक इंतजार करेंगे और संसदीय चुनाव में अपने सांसदों की संख्या में इजाफा के बाद ही सम्मानजनक समझौता करेंगे। भाजपा अभी काफी ताकतवर पार्टी है। उसके समक्ष पुरानी सहयोगी और क्षेतीय दल धराशायी हैं। नीतीश अभी भाजपा के साथ जुड़ कर दोयम दर्जा नहीं पाना चाहेंगे। बहरहाल नीतीश कुमार महागठबंधन से बाहर नहीं निकलेंगे और एनडीए में शामिल होने की भाजपा और लोजपा नेताओं की सलाह नहीं मानेंगे। सत्ता के गलियारे में इसे नीतीश-मोदी की नजदीकी और महागठबंधन के अंत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन नीतीश गठबंधन में रहते हुए आगामी संसदीय चुनाव में अपने सांसदों की संख्या में इजाफा करना चाहेंगे। पुत्र मोह में लालू प्रसाद तो महागठबंधन तोड़ने का भयानक सपना देख ही नहीं सकते।

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