बी. बी. रंजन की कलम से – बिहार में असहिष्णुता

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बी. बी. रंजन की कलम से

बिहार       में       असहिष्णुता

क्या महादलित, क्या पिछड़ा, क्या सवर्ण
सबके सहयोग से स्थापित हो लोकतंत्र

       जरूरत नफ़रत की दीवार तोड़कर भाईचारा कायम करने की है. बगैर सामाजिक भेदभाव के सभी जाति के गरीबों के कल्याण की जरूरत है.

       बिहार में जातीय और धार्मिक राजनीति के लम्बरदारों की असहिष्णुता खतरनाक है। बिहार में प्रताड़ना की राजनीति करनेवाले लोग असहिष्णुता के खिलाफ भी बोलते हैं। सम्प्रदायवाद की राजनीति करनेवाले धर्मनिरपेक्षता का ढिढोरा पीटते हैं। जाति भेद को कायम रखने वाले सामाजिक न्याय की बात करते हैं। अगड़ा-पिछड़ा की दूकान चलानेवाले न्याय के साथ विकास की ठेकेदारी करते हैं। सवर्णों के खिलाफ आग उगलनेवाले असहिष्णुता की बात करते हैं। घोटालेबाज खजाना के रक्षक होते हैं। कानून तोड़नेवाले कानून के रखवाले हैं।
बिहार में ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा दिया जाय तो सामाजिक न्याय की लड़ाई, लेकिन सवर्ण अपनी खेत की रखवाली करे तो असहिष्णुता। रमना रोड में ताजिया के दौरान नाजायज हथियार से हवाई फायर जश्न का वातावरण, लेकिन इसके खिलाफ आवाज उठायी जाय तो असहिष्णुता। राह चलती महिलाओं के साथ प्रतिदिन होनेवाला तीन घोषित बलात्कार महिला सशक्तिकरण है, लेकिन उसके खिलाफ उठनेवाली आवाज असहिष्णुता। पन्द्रह प्रतिशत पर पचासी प्रतिशत की जीत का नारा न्याय के साथ विकास, लेकिन स्वच्छ राजनीति की वकालत असहिष्णुता। सोनिया गाँधी का समर्थन प्राप्त करना बहुजन हिताय, सवर्णों को विदेशी कहना सामाजिक न्याय। सवर्णों को विदेशी करार देना सेक्यूलरिज्म, लेकिन इसका विरोध असहष्णिुता। नरसंहार की स्थिति में जाति आधारित भुगतान न्यायपूर्ण कार्रवाई, लेकिन निर्णय और समानता की माँग असहिष्णुता। आशय यह कि मतों के लम्बरदार जो भी करें तो वह सामाजिक न्याय और हर अच्छी बातें सामन्तशाही। गैरविकासवादी सरकार की वापसी के लिये भड़काऊ बयानों का प्रयोग न्याय के साथ विकास, लेकिन  इसका विरोध जमीन्दारी। चुनावी लाभ के लिए सेक्यूलरिज्म के नाम पर साम्प्रदायिकता फैलाना अखण्डता की रक्षा, हम समान नागरिक कोड की बात करें तो दबंगई। अब तक हासिये पर विराजमान दलितों और पिछड़ों के आरक्षण की बात करें तो आरक्षण के खिलाफ साजिश, वे गरीबों के हक को गरीबी के नाम पर अरबपति दलितों और पिछड़ों में बाँटते रहें तो समानतावाद। चुनाव में विकास का मसला उठायें तो असहिष्णु, वे विकास राशि को मटियामेट करते रहें तो गरीबों के मसीहा।
कभी कार्यालयों को 9 से 6 का कार्यकाल बनाना और फिर निर्णय की वापसी, कभी विद्यालयों के संचालन के वक्त में परिवर्तन और फिर बैकपुफट पर, सरकारी अस्पतालों में नाम मात्रा की सुविधा का लच्छेदार प्रचार, बीडीओ एवं सीओ के पदों का एकलीकरण और पिफर पुरानी स्थिति। राज्य को शराब की दूकानों से पाटना और फिर शराबबंदी। शिक्षकों की चयन-प्रक्रिया में हर बार बदलाव। एक ओर अस्पतालों का दावा और दूसरी ओर पफर्जी एवं मँहगें निजी नर्सिंग होमों की बाढ़। एक तरफ सरकारी शिक्षण संस्थानों को सुधारने के ढिढोरे तो दूसरी तरफ मँहगें निजी संस्थानों की माफियागिरी। एक तरफ अपराध नियंत्रण की हवाबाजी और दूसरी तरफ अपराध का बढ़ता ग्राफ। कभी काँग्रेस के विरोध से राजनीति में प्रवेश और फिर गठबंधन, राजद की नीतियों के खिलापफ मुहिम और अंततः सत्ता के लिये समर्पण। सार यह कि उन्हें जहाँ से इलेक्शन माईलेज मिले तो वह सामाजिक न्याय, अगड़ों-पिछड़ों के बीच तनाव पैदा कर उन्हें गरीबों का ध्यान विकास से भटकाने में लाभ मिले तो सामाजिक न्याय, लेकिन हर कोई यदि हक की मांग करे तो सामंतशाही.
आज कार्यालयों में सत्ताधारी कुर्ता-पाजामाधारी दलाली करे तो जागरूकता, आप विरोध करें तो अन्याय। यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे तो दबंगई, लेकिन वसूलीकर्ता जनसेवक। सारांश यह कि यदि आपने सत्ताधारी दबंगों, वसूलीकर्ताओं और महिला उत्पीड़न का विरोध किया और हासिये पर विराजमान पिछड़ों और महादलितों की वकालत कर दी तो आप असहिष्णु हो गये। चलाती ट्रेन में महिलाओं के साथ छेड़खानी पर सरकारी चुप्पी कानून का राज और इसके खिलाफ उठाती आवाज़ असहिष्णुता. यदि आपने सवर्णों के उचित माँगों का समर्थन कर दिया तो असहिष्णु हो गये। यदि अल्पसंख्यकों की ज्यादतियों का विरोध कर दिया तो आप साम्प्रदायिक हो गये। यदि अमीर पिछड़ों और दलितों को आरक्षण के दायरे से हटाने की वकालत कर दी तो आप आरक्षण विरोधी हो गए। यदि एक अनैतिक दलित का आपने विरोध कर दिया तो आपके ऊपर फर्जी मुकदमे हो गये, यदि आपने मुकदमों के न्यायपूर्ण निष्पादन की माँग कर दी तो जाँच को प्रभावित करने की कोशिश हो गयी। लोकलुभावन बाते कर पोलिटिकल माइलेज लेना हुआ तो तेजस्वी अभी पिछड़ा हो गए. डिअर पर विवाद को अपने पक्ष में करने के लिए अशोक चौधरी महादलित का राग अलापने लगते हैं. पोलिटिकल विवाद में भी महादलित का माइलेज लिया जाता है. अथार्त पिछड़ा और महादलित का राग वैसे लोग अलापते हैं जो निरूत्तर हैं, महाअगड़ा हैं, लेकिन पिछड़ों और महादलितों का लाभ लेते रहना चाहते हैं. यही सच्चे अर्थों में दलितों और पिछड़ों का शोषण है. दलितों और पिछड़ों के नाम पर सत्ता की राजनीति करनेवाले ही उनके सबसे बड़े शोषक हैं.

        दलितों की याद तब नहीं आती जब उन्हें कार्यालयों में रिश्वत देनी पड़ती है और वसूलीकर्ता भी दलित या पिछड़ा ही होता है। महादलितों को तब प्रशासनिक सक्रियता नहीं दिखती जब सत्ता पर हावी ताकतवर तथाकथित पिछड़ी जातियों के गुण्डे दलित महिलाओं की इज्जत पर आक्रमण करते हैं। जब सत्ता में हनक रखनेवाली जातियों के लोग जुल्म ढाते हैं तो सारे दलित एक्ट शिथिल पड़ जाते हैं, सामाजिक न्याय के सारे ठेकेदार खामोश हो जाते हैं।
वोटों के लिए दलितों, अल्पसंख्यकों और अति पिछड़ों की सूचियों में लगातार परिवर्तन करनेवाले सामाजिक न्याय के पुरोधा हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि कई महादलित, पिछड़ी एवं सवर्ण जातियों के लोग सरकारी जाति के दबंगों के खिलाफ पुलिसिया शिकायत की हिम्मत नहीं करते। बहरहाल चलती ट्रेन में छेड़खानी की शिकार एक डॉक्टर की बीबी के द्वारा शिकायत दर्ज नहीं करने की खबर चली है. यदि किसी ने हिम्मत की तो मामलों के जाँच के कई पड़ाव हैं, परिणाम भुगतने की धमकी देने के कई अवसर हैं, राजीव नगर का उदाहरण सामने है।

    ऐसी क्या मजबूरी हो गयी कि सरकार के सर्वशक्तिमान को बार-बार अपने विधायकों को दायरे में रहने की नसीहत देनी पड़ी। भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेन्स के दावों के बीच मंत्रियों और विधायकों को बार-बार स्टिंग से होशियार रहने की सलाह क्यों जरूरी है। सामाजिक न्याय की सरकार में राजवल्लभ, सरफराज, गंगेश्वर और गोपाल मंडल जैसे विधायक भी शरीक हैं। कभी उषा सिन्हा भी सरकार में रहीं है. चंद दिनों पहले तक लालकेश्वर प्रसाद की चलती रही है. आज मेरिट घोटाले में जुड़े अधिकांश लोग सरकारी जाति के ही हैं. जबाब सिर्फ कार्रवाई का नहीं है। सवाल ऐसे कुख्यात लोगों को टिकट देने का है। सवाल इन घटनाओं पर पूर्ण विराम का है. सफल सरकार के दावेदारों को पुनर्वापसी के लिये जातीय और धार्मिक कार्ड खेलना पड़ा। प्रदेश के मुखिया को राज्य के बिगड़ते हालात से जनता का ध्यान हटाने के लिए सात निश्चय पर लगातार बोलना पड़ता है, कभी शराब के पक्ष में बोलते थे, अब शराब के खिलाफ मुहिम चलाते हैं.
अभी कोचिंग एक्ट पर तो अमल हुआ नहीं कि क्लिीनिकल एक्ट की बात आ गयी। कार्यालयों में व्याप्त मौन एवं आर्थिक भ्रष्टाचार पर पकड़ बनाने में असफल सरकार को मीडिया के स्टिंग से डर लगता है। सरकारी अस्पतालों की सुधरती व्यवस्था के दावों के बीच मरीजो की संख्या घट रही है. यह सकारात्मक भरोसा का ह्रास दर्शाता है. लेकिन विद्वेषपूर्ण कार्ड की हनक अभी मौजूद है.

       हद तब हो जाती है जब सत्ताधारी दल का विधायक सरकारी आवासों पर कब्जा जमा लेता है, थानाप्रभारी और डीएसपी को धमकी मिलती है, एएसपी को गोली लगती है, रंगदारी के मामलों में दिनदहाड़े एके-47 से हत्या की जाती है। सवाल अपराधियों की गिरफ्तारी पर पीठ थपथपाने का नहीं है। सवाल जान की कीमत का है। हद तब हो जाती है जब जिलाधिकारी के कार्यालय परिसर में एक दलित लड़की से बलात्कार किया जाता है। क्या सर्वस्व खो चुकी महिलायें चंद रूपयों की सहायता से अपनी लुटी अस्मत वापस ला सकतीं हैं? हद तब हो जाती है जब कुरमुढ़ी में दलितों के साथ होनेवाली बलात्कार की घटना पर उबलनेवाली सरकार सासाराम की बलात्कार की घटना पर चुप्पी साध लेती है, जिलाधिकारी कार्यालय के कैंपस की बलात्कार की घटना पर जुबान बंद कर लेती है, राजवल्लभ की पीड़िता की जाति नहीं बतायी जाती, सरफराज के छेड़खानी मसले पर खानापूर्ति की जाती है, नौबतपुर की महिला के साथ हुये बलात्कार पर मौन बरती जाती है, एम्स के पास अस्मत बचाने को आत्महत्या करनेवाली महिला के बच्चे अनाथ हो जाते हैं, सरकारी विधायक सुरा और सुंदरी पर वक्तव्य देता है, हत्या की राजनीति करने का एलान करता है। लेकिन आत्महत्या करनेवाले रोहित वरमूला पर बिहार के नेताओं की जुबान चलती है, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने का सपना हिचकोले ले रहा है।
आश्चर्य होता है जब सरकारी कार्यालयों में तैनात निदेशक को सरकारी जातियों के आदेशपालों से डर लगता है। एक जिला शिक्षा पदाधिकारी विद्यालय में तैनात सरकारी जाति के एक आदेशपाल के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाता। एक पूर्व डीजीपी पटना में पदस्थापित सरकारी जाति के एक महिला दारोगा के खिलाफ कार्रवाई करने की जुर्रत नहीं करता। मुजफ्फरपुर क्षेत्र में बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार के भाई से अपराधी रंगदारी की माँग करते हैं। पत्रकार मामले को सरकार के महत्वपूर्ण जिम्मेदार अंगों तक पहुँचाता है। लेकिन सरकारी तंत्र उसे मामले को सेट कर लेने की नसीहत देते हैं। पत्रकार को मामला सेट करना पड़ता है। न्याय के साथ विकास, सेक्यूलरिज्म, भ्रष्टाचार पर जीरो टोलेरेन्स और चतुर्दिेक विकास की बातें बेकार लगतीं हैं।

       जरूरत नफ़रत की दीवार तोड़कर भाईचारा कायम करने की है. बगैर सामाजिक भेदभाव के सभी जाति के गरीबों के कल्याण की जरूरत है. एक जिम्मेदार और सफल सरकार को जनहित में निष्पक्ष कार्य करने की जरूरत होती है.

        किसी भी व्यक्ति या सामाजिक समुदाय या जातीय समुदाय या धार्मिक समुदाय के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति या जातीय समुदाय या धार्मिक समुदाय के प्रति भेदभाव या प्रताड़ना का रवैया असहिष्णुता है। लेकिन हमारे देश में सत्ता के ठेकेदारों ने अपनी सुविधा के अनुसार असहिष्णुता की परिभाषा गढ़ दी।             आज देश में कभी भी मुस्लिम असहिष्णुता का शिकार नहीं है. राजंनैतिक और सामाजिक लाभ के लिए चाहे जितनी चालें चलीं जायें, लेकिन आज महादलित और पिछड़ें सम्मानित हैं. आज सबसे ज्यादा उपेक्षित सवर्ण हैं, असहिष्णुता का सबसे बड़ा शिकार सवर्ण है जिसकी न तो कोई सुननेवाला है और न ही माननेवाला है. सवर्ण दमनकारी करवाई के भय से दुबक जातें हैं जब राजनैतिक लाभ के लिए दलित और पिछडों की बाते उठतीं हैं. दरअसल राजनैतिक लाभ के लिए गैरविकासवादी जातिवादी राजनेताओं ने इस मसला को जिन्दा रखा है. बिहार में जातीय और धार्मिक राजनीति के लम्बरदारों की असहिष्णुता खतरनाक है।

 

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