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बिहार एनडीए में कुछ भी ठीक नहीं: बी बी रंजन

अमित शाह से मिलने में विफल और आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर सशंकित नीतीश ने अशोक चौधरी और रामविलास पासवान से गठजोड़ कर दलित, महादलित, गैर यादव अति पिछड़ा और सवर्ण मतदाताओं के बीच पैठ बनाकर राजद और भाजपा से दीगर एक मोर्चा बनाने की संभावना भी तलाशने लगे हैं। कर्पूरी ठाकुर की जयंती में अति पिछड़ों के लिए अलग से आरक्षण की मांग और भारत रत्न का मसला, पुनपुन में गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक महादलित के हाथों झंडोत्तोलन, पशुपति पारस को मंत्रालय, अशोक चौधरी को विधान परिषद् में भेजने और मंत्री पद देने की गारंटी और विकास यात्रा के माध्यम से संगठन को मजबूती प्रदान करने की कवायद से इसकी पूरी प्रबल संभावना बनने लगी है।
दिल्ली के कामराज रोड में नीतीश कुमार को बंगला मिल रहा है, जेड ग्रेड की सुरक्षा मिल रही है, लेकिन अमित शाह के दर्शन को प्यासे नीतीश रामलाल से मिलकर लौटने को विवश हैं। सशंकित नीतीश ने भाजपा और राजद से अलग एक सियासी समीकरण बनाने की कवायद जारी रखी है और विकास यात्रा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन एवं जद यू के जिलाध्यक्षों को सौंपकर भाजपा को इससे दूर रखा है। यह सांगठनिक मजबूती की कवायद है। आगामी चुनाव में नीतीश कुमार दलित-महादलित-अति पिछड़ा-सवर्ण गठजोड़ के तहत चुनाव में आने की संभावना भी तलाश रहे हैं। इसी रणनीति के तहत गणतंत्र दिवस पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना जिले के पुनपुन के जाहिदपुर गांव के महादलित बस्‍ती में पहुंचे जहाँ गांव के सबसे बुजुर्ग महादलित दीनदयाल दास ने झंडा फहराया।
नीतीश कुमार लोकसभा में अपनी पसंद की भरपूर सीटों की चाह रखते हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो अमित शाह जदयू को अपने पसंद की महज 8 या 10 सीटें देना चाहते हैं। नीतीश इस पर सहमत नहीं दिखते। दूसरी और मुख्यमंत्री पद को लेकर सशंकित नीतीश विधानसभा चुनाव भी लोकसभा के साथ ही कराना चाहते हैं, लेकिन अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के बीच अभी संसदीय चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव कराने पर गंभीर मंथन जारी है। महाराष्ट्र, छतीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, बिहार सहित सात राज्यों में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव कराने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन भाजपा संसदीय चुनाव नरेन्द्र मोदी की छवि पर लड़ना चाहती है। लेकिन विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराने की स्थिति में स्थानीय मुद्दों और भाजपा शासित प्रदेशों में सत्ता विरोधी लहर के खतरे को नकारना नासमझी होगी। लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव होने की स्थिति में भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी आसानी से नहीं सौपना चाहेगी और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के पद पर कोई रिस्क लेना नहीं चाहते।
सदन से बाहर बैठे रामविलास पासवान के भाई को मंत्रालय में जगह देकर नीतीश ने दलित नेता रामविलास पासवान से नजदीकी बढ़ा ली है। पिछले कई वर्षों से विपक्षी दलों द्वारा भाजपा को दलित विरोधी साबित करने की कोशिश रही है और एनडीए के घटक होने के नाते रामविलास पासवान को दलित-अत्याचार के मसले पर चुप रहना पड़ा है। यह चुप्पी उनके राजनैतिक कैरियर के लिए चुनौती पेश करता है और पासवान असहज महसूस कर रहे हैं। बिहार में जदयू-भाजपा विलगाव की स्थिति में पासवान दलित चेहरा के रूप में नीतीश कुमार के साथ जाने को सहमत दिखते हैं। महादलित चेहरा अशोक चौधरी अभी तोड़फोड़ मचाने की नीयत से कांग्रेस में बने हुए हैं, लेकिन उनका जनता दल यू में आना निर्धारित है। चौधरी जदयू कोटे से विधान परिषद् में भी भेजे जायेंगे और मंत्री भी बनेंगे। नीतीश कुमार आगामी चुनाव में उन्हें महादलित चेहरा के रूप में इस्तेमाल करेंगे। गैर यादव अति पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व नीतीश कुमार खुद करेंगे।
नीतीश कुमार और अखिलेश यादव ने गैर यादव पिछड़ी जातियों की रिझाने के लिए कर्पूरी ठाकुर की जयंती मनाई। अखिलेश ने इस रणनीति के तहत उत्तम पटेल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। दलित को विभाजित कर महादलित और मुसलमान को विभाजित कर पसमांदा की राजनीति करनेवाले नीतीश कुमार ने अति पिछड़ों को पिछड़ों से अलग करने की सोच के साथ ही अति पिछड़ों के लिए अलग से आरक्षण की मांग की है और भाजपा की अति पिछड़ा गोलबंदी की जारी रणनीति पर आक्रमण किया है। रामनाथ ठाकुर का राज्यसभा में होना, कर्पूरी ठाकुर के लिए भारत रत्न की मांग, भावी राज्यसभा चुनाव में जदयू की और से एक महादलित और एक अति पिछड़ा चेहरा को राज्यसभा भेजने की प्रबल संभावना भाजपा और राजद से अलग एक मोर्चा बनने का संकेत है।
सवर्ण मतदाताओं के बीच नीतीश कुमार और रामविलास पासवान के प्रति लालू की तरह नफ़रत नहीं है। भाजपा पिछड़ी जाति को गोलबंद करने की भरपूर कोशिश करती रही है। सवर्ण मतदाता भाजपा की इस रणनीति से बहुत नाराज तो नहीं हैं, लेकिन विकल्पहीनता की स्थिति मानकर पूर्णतः संतुष्ट भी नहीं हैं। आगामी चुनाव में नीतीश और पासवान सवर्णों को ज्यादा टिकट देकर अपनी और आकर्षित करने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं।
उपेन्द्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी को राजद का खुला निमत्रण मिलने लगा है। भाजपा नीतीश पर कण्ट्रोल रखने की नीयत से अब कुशवाहा को खोना नहीं चाहती। लालू के इशारे पर नीतीश कुमार ने मांझी को सीएम के पद से मुक्त किया था। भाजपा मांझी को इसकी याद दिला रही है, लेकिन जीतनराम मांझी को किसी भी ओर मोड़ना आसान है। उनकी करवट का अंदाजा लगाना मुश्किल है। बहरहाल मांझी राजद के संपर्क में बने हुए हैं।
सम्पूर्ण राजनीतिक दृश्यों को देखें तो भाजपा पर दबाव बनाने की फिराक में उपेन्द्र, नीतीश, पासवान और मांझी की सक्रियता बढ़ी हुयी है। ऐसे मुख्यमंत्री के पद की भरोसेमंद गारंटी के बाद नीतीश कुमार पलटी मार सकते हैं, लेकिन अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा बिलकुल बदल गयी है, सभी राज्यों में भाजपा सरकार की नरेन्द्र मोदी महत्वाकांक्षा से नीतीश कुमार सहमे हुए हैं। काउ किस करवट बैठेगा, यह कहना मुश्किल है। … और चुनावी जीत के लिए तो सबकुछ जायज है। सत्ता के संघर्ष में न विचारधारा है, न जननीति है, न पारदर्शिता है। वहां भावना है, स्वार्थ है, ठगी है।

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