बदलते परिदृश्य में सवर्णों को आरक्षण की जरूरत :बी. बी. रंजन

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मतदाताओं की सजगता पर सवालिया निशान हैै

 

हम सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक नहीं हैं

 

पुष्यमित्र शुंग एक मात्र ब्राह्मण राजा थे। राजपूत तो महज क्षत्रप थे। भारत में सत्ता सनातन पिछड़ों की रही है। मौर्यवंश, गुप्तवंश का ही शासन रहा है। सत्ता की भूख से पनपी फूट से देश में विदेशी अल्पसंख्यकों ने पाँच सौ वर्षों तक राज किया और कालांतर में अंग्रेज भी। आजादी के बाद बिहार में 33 वर्षों तक पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मुख्यमंत्री रहे, जबकि सवर्ण 29 वर्ष। पिछड़ों और दलितों के वंशानुगत प्रतिनिधि खुद महाअगड़ा हो गए, लेकिन न पिछड़ापन गया, न गरीबी गयी।
         अगड़ा बनाम पिछड़ा, पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा, दलित बनाम महादलित, अल्पसंख्यकों के बीच पसमांदा जैसे विद्वेषपूर्ण शब्द मतों के लिए पैदा किए गए। चिराग, संतोष, तेजस्वी, मीसा, तेजप्रताप, अखिलेश और मीरा कुमार आज भी पिछड़ा हैं। आजादी के 68 वर्षों के बाद भी भारत में अगड़ों और पिछड़ों की स्वार्थी राजनीति जिन्दा है। अगड़ें महादलित से बदतर हो गए, लेकिन सवर्णोेंं की आवाज बननेे से सवर्ण राजनेता और अधिकारी परहेज करते रहे। रामजतन सिन्हा को छोड़ दें तो किसी भी राजनेता ने भूमिहारों का पक्ष नहीं उठाया. टिकट और मंत्रालय मिलने के बाद उन्हें अपना सुख और अपनी सुरक्षा का ख्याल रहा और सवर्ण मतों की गोलबंदी की उन्हें महज चुनावों  में याद आती रही. सवर्ण मतदाताओं के सही मसले को खुलेआम उठाने से सवर्णों के कोटे से आने वाले राजनेता बचते रहे ताकि उनके आका उनसे नाराज न हो जायें. चुनावी जातीय समीकरण बनाकर सवर्णों को मूर्ख बनाने में ही उनकी सक्रियता दिखती रही. जिला परिषद् के चुनाव में पटना बैठे ऐसे आका सभी स्वजातीय प्रत्याशियों को हराने की मुहिम चलाते रहे ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए उन्हें कहीं से ललकार की संभावना न दिखे. प्रमुख के चुनाव में स्वविवेकी प्रत्याशियों को हराने में प्रायः इन सभी सवर्ण नेताओं  की गभीर और गुमनाम भूमिका देखी जाती रही है. सवर्ण उदयमान नेताओ के पर कतरने में इनकी भूमिका रही है. चुनावोपरांत इनकी विकास की नीति जाति आधारित होती है. सवर्ण प्रतिनिधि सवर्ण मतों को सवर्णों की मजबूरी मान लेते हैं और उनके जरूरी कार्यों को हासिये पर रखते हैं. भारत की प्रायः हर सरकार हिन्दू मतों को गोलबंद कर सत्ता में आती है और फिर अल्पसंख्यक के नाम पर मुस्लिम मतों की गोलबंदी कर सवर्ण मतों से छुटकारा पाना चाहती है. ठीक ऐसे ही बिहार की सत्ता अक्सर सवर्णों मतों की गोलबंदी से मिलती रही है और सत्ता प्राप्त पार्टियाँ फिर दलित और पिछड़ी जातियों में दरार पैदा कर मुस्लिम मतों के सहयोग से सत्ता के स्थायित्व की खोज में निकल पड़ती हैं, सवर्णों पर निर्भरता समाप्त करना चाहती है. सवर्ण मतों की एकजुटता से सत्तासीन दल आगामी पांच वषों तक सवर्ण मतदाताओं का खुला शोषण कर जातीय विद्येष फैलाई जाती है और सवर्णों के हितों की उपेक्षा की जाती है. सवर्ण मतों के ठीकेदार लगभग सारे राजनेता तब अपने आका की वफादारी में लगे होते है, सवर्णों के हितों के विरोध में बोलकर विश्वस्त बनने में व्यस्त होते हैं. उन्हें सवर्णों की गलियों में बंटनेवाले चापाकलों की सूची पर खीझ आती है, क्योंकि अंततः इन सारे मतों के प्रति सवर्ण नेता आश्वस्त होते है. बंदा जायेगा किधर वाली बात है. सवर्ण मतों की एकजुटता से सत्तासीन लालू और नीतीश सरकार के  उदहारण सामने हैं, वीपी सिंह सरकार की नीति जनमानस के दिमाग से ओझल नहीं हुई है.
        बलिदान और देशभक्ति की बदौलत देश में सवर्णों ने अपनी जगह बनायी। आज भ्रष्टाचारियों ने 15 और 85 प्रतिशत की बात चला दी। आजादी के बाद सत्तालोलुप राजनीतिज्ञों ने जाति, धर्म और स्वार्थ की राजनीति प्रारंभ कर दी। सत्ता के लिए एक जाति विशेष के खिलाफ डफली बजायी। घोटालेबाज शहीद की भूमिका में आते गये, गरीबों में सवर्णों के प्रति विद्वेष पैदा किया गया। भ्रष्टाचारी, धनबली, बाहुबली सत्तासीन हो गये। धनबली गरीबों की पसंद बनते गये और समाज पिछड़ता गया। गरीबों के मसीहा होने का दंभ भरनेवाले धनबली हो गये, जनसेवक हासिये पर चले गए। सजायाफ्ता को सत्ता मिल गयी। फरेबियों को सम्मान मिल गया। विवेकशील जागृति सेे स्वार्थ की राजनीति का पटाक्षेप होता है। विद्वेष विकासरोधी होता है, असफल सत्तासीनों की पुर्नवापसी कराता है। मुद्दों से भटकाव और सहज जीत के लिए उपजातियाँ बनायीं जातीं हैं, गरीबी, अशिक्षा और अपराध को जिन्दा रखा जाता है। बीपीएल धारकों की निःशुल्क चिकित्सा सेवा में लूट मचानेवाले राज्यों के नेतृत्वकर्ता पिछडें या दलित हैं। सरकारी अस्पताल और विद्यालय खास्ताहाल हैं। प्रसव—वेदना से तड़पती महिलायें, डायरिया से काल—कवलित होते लोग और बीमारीग्रस्त गाँवों से एएनएम और पशु—चिकित्सक फरार हैं। आदेशपाल का वेतन शिक्षकों से अधिक है। यह ‘सामाजिक न्याय’ और ‘न्याय के साथ विकास’ की दास्ताँ हैै। सुशासन की सरकार है। फर्जी आरा मिल, फर्जी कोचिंग संस्थान, फर्जी विद्यालय, फर्जी नर्सिंग होम्स, एमडीएम में मची लूट, माफिया के हाथ में शिक्षा, अपराध का बढ़ता ग्राफ, रोज तीन बलात्कार और अनगिनत अत्याचार— यही है आपका उभरता बिहार। आजादी की बयार और परिवर्तन की मुहिम में सवर्णों की सक्रियता रही। 1977 की जनता पार्टी की सरकार सवणों ने बनायी तो कर्पूरी जी के आरक्षण का लाभ गरीब दलितोेंं के नाम पर अमीरों को मिला। 1989 में केन्द्र और 1990 में बिहार में जनता दल की सरकार सवणों की सक्रियता का परिणाम थी, लेकिन महत्वाकांक्षाजनित मंडल आरक्षण का लाभ हकदारों से दूर रहा। सवणों की मदद से 2005 में बनी नीतीश सरकार जाति कार्ड खेलती रही। आरक्षण का लाभ सिर्फ दो ताकतवर जातियों ने हड़प लिया। पाँच सौ छिद्रों वाली गंजी धारक सवर्णों को सामंत कहा गया। सामाजिक न्याय की सरकार पिपरा, तिसखोरा, बेलछी और अररिया कांड पर चुप्प रही, भागलपुर दंगा रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाला गया। खुलेआम विरोध की राजनीति और बिना शर्त समर्थन सवर्णों की पहचान है। आज किसी भी दल में सवर्णों के पास निर्णायक अधिकार नहीं हैं। सरकार सवर्ण बनाते हेैं, सरकार सवर्ण गिराते हैं, लेकिन सरकार न तो सवर्णों केे लिए चलती है, न तो सवर्ण सरकार चलाते हैं। मंत्रालय खाली है, सवर्णों की चुनावी सक्रियता जारी है। सवर्ण आयोग की रिपोर्ट के अनुसार राजपूतों के पास औसतन 1.91 एकड़, भूमिहारों के पास 1.41 एकड़ और कायस्थों के पास 0.45 एकड़ जमीन है। 81 प्रतिशत सवर्णों के पास मामूली भूमि है। 82 प्रतिशत सवर्ण मजदूरी पर निर्भर हैं। 49 प्रतिशत सवर्ण बेकार हैं। सवर्ण शोषित, दमित और उपेक्षित हैं। सवर्ण साजिश के शिकार हैं। जागरूकता शांति, समृधि  एवं सुख की जननी है। एक सजग, दृढ़ और विचारपरक निश्चय की जरूरत है। सवर्णों की निर्धारित नीति नहीं है। अराजकता की स्थापना लोकतंत्र का पराजय हैै। हम जिला परिषद् में जाति कार्ड खेलते हैं, विधानसभा चुनाव में बाहरी प्रत्याशी के नाम पर विरोध का दोहरा मापदण्ड अपनातेे हैं, लोकसभा में बाहरी जातीय नेता का स्वागत करते हैं। दोहरा मापदण्ड लोकतंत्र के लिए घातक है, यह अनैतिक विचारहीनता है, स्वार्थी राजनीति है। सवर्णों को सशर्त समर्थन देने की जरूरत है। उन्हें अपनी लोकतांत्रिक शक्ति का एहसास कराना होगा। सवर्ण मतों की सेलिंग रोकनी होगी। सवर्णोेंं के पक्ष में बोलने से बचनेवालों को पैदल चलता करना होगा। आज बदलते परिदृश्य में सवर्णों को आरक्षण की जरूरत है। सारे पिछड़े अपने समर्थकों के पक्ष में बोलते हैं। सवर्णों की आवाज कौन बनेगा? हर बार चुनावी जीत का समीकरण बैठाने की जिम्मेदारी सवर्ण उठा लेते हैं। सवर्णों केे कमाऊ प्रचारक चंद रूपयों के लिए सक्रिय हो जाते हैं। भटके लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिये हर घर से अभियान चलाना होगा। कई प्रतिनिधियों के भाई और परिवारवालेे धान—क्रय—केन्द्र , अंचल, प्रखण्ड, थाना और बैंक के बिचौलिया हैं। राजस्व कर्मचारियों की खुलेआम दादागिरी है, उनके निजी सहायकों की मनमानी है और आपके प्रतिनिधियों की वहाँ बैठकी लगती है। प्रसव—वेदना से कराहती महिलाओं की उपेक्षा होती रही है, रेबीज की खरीद बाजार से करनी पड़ती है, एफआइआर का रेट निर्धारित है, श्रम विभाग में उगाही है और जिला उद्योग केन्द्रों में मनमानी है, क्योंकि प्रतिनिधि शिथिल हैं, सरकार निष्क्रिय है। मानव भूखमरी, सुखाड़, अकाल, मँहगाई, मुनाफाखोरी, कालाबाजारी, भ्रष्टाचार, निकम्मी पुलिस, लापरवाह प्रशासन एवं अनैतिकता के खिलाफ संघर्ष जातीय उन्माद के समक्ष फीकी है। गायों को कसाईयों के हाथों बेचने को हम जिम्मेदार हैं। सरेआम महिलाओं के साथ कुत्सिक मानसिकता बलात्कार करती है। नशेड़ियों के द्वारा महिलाओं को सरेआम छेड़ा जाता है। जागरूक महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की जातीं हैं, नारी को वासना की वस्तु समझी जाती है। दुर्गा की मूर्ति के बगल में नारियों को नचाया जाता है। दहेज देने में अक्षम बाप की बेटियों की विलंबित शादियों पर ठहाके लगते हैं। मौत के कगार पर पहुँचे पड़ोसी को सूदखोरी में फँसाया जाता है, उसकी जमीन नीलाम होती है। लेकिन राजनेता जब चुनावी माहौल में गोरक्षा और सुअर—वध की बातें करते हैं, अगड़ों—पिछड़ों की आग लगायी जाती है, यज्ञ के नाम पर भक्तों और दानवीरों की गुहार लगायी जाती है, अल्पसंख्यकों के नाम पर फर्जी सेक्यूलरिज्म चलाया जाता है तो हमारी पौरूषता, हमारी दानवीरता, हमारा स्वाभिमान, हमारी जिम्मेदारी जागृत होते हैं। सरस्वती की सवारी हंस, माँ दुर्गा की सवारी शेर, गणेश की सवारी चूहा और मत्स्य पर भी विवाद हो सकता है। आज कम उम्र की नादान लड़कियों को बहकानेवाला हमारा प्रतिनिधि है। पैसा का प्रलोभन देकर जिस्मफरोसी के धंधे में उतारनेवाला हमारा प्रतिनिधि है। चलती रेल में छेड़खानी करनेवाला हमारा प्रतिनिधि है। हत्या की धमकी देनेवाला सरकार में बैठा है। कितने लोगों की बात करूँ। आज मतदाताओं की सजगता पर सवालिया निशान हैै। दो वर्गों के बीच खाई गहरी कर नरसंहार करानेवाला वंशवादी मानवता दर्शाता है। दो वर्गों की खूनी खेल के बीच अपना मजबूत राजनैतिक आधार तलाशता विध्वंशक जातिवादी मसीहा बनता है। सजायाफ्ता सत्ता—संघर्ष की मुहिम चलाता है। घोटालेबाज अपनी सजा को शहादत बतलाता है। अल्पसंख्यकों का भयादोहन करनेवाला मसीहा की छवि स्थापित करने में सफल हो जाता है। लेकिन समाजसेवा के लिए उत्साहित एक समर्पित योद्धा हतोत्साहित होकर समाज की सोच पर रोता है, असफल होकर दर—दर की ठोकरें खाता है। जाति—धर्म से ऊपर की सोच रखनेवाले सेवियों के समर्पण पर स्वार्थी तत्व मुस्कुराते हैं, क्योंकि अपने हितों के प्रति हम जागृत नहीं हैं, हम पारदर्शी नहीं हैं, हम सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक नहीं हैं। जाति—धर्म के बीच नफरत पैदा करनेवाला शख्स हमेशा राजनीतिक जमीन की तलाश में है। सत्ता समर्थित एक—दो जातियों ने सवर्णों, दलितों और पिछड़ों को अपमानित किया। विकास, मँहगाई और भ्रष्टाचार पर निर्णायक अभिव्यक्ति के बजाए जाति और धर्म का मसला उठता है। रोजगार की जगह आरक्षण का राग छेड़ा जाता है। प्रतिभा को आरक्षण की आड़ में कुचल दिया जाता है। गिरती विधि—व्यवस्था विरोधियों की साजिश बता दी जाती है। विकास पर भावना हावी हो जाती है। यह तर्क पर भावना की जीत की परिणति है, यह हमारी 69 वर्षों की अदूरदर्शी सोच की परिणति है। अपहरणकर्ता, सुपारी किलर और मानव—तस्कर जाति नहीं पूछते। शिक्षा माफियाओं के द्वारा संचालित मँहगे शिक्षण—संस्थान और निजी अस्पतालों की ऊँची फीस जाति आधारित नहीं होती। उबड़—खाबड़ ठेसीली सड़कों पर चलनेवालों के नाखून जाति पूछ कर नहीं उखड़ते। सरकारी कार्यालयों में सभी भ्रष्टाचार पीड़ितों की स्थिति एक समान होती है। मौन भ्रष्टाचार के शिकार सभी हैं। अराजकता से सभी परेशान हैं। कहने को न्याय के साथ विकास का दौर है। कहने को सामाजिक न्याय की सरकार है। कहने को भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेन्स की नीति है। कहने को कानून का राज है। विज्ञापनों में ऐसा मैंने भी देखा है।

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