राजनीति

नीतीश की वादाखिलाफी से निकली मानव श्रृंखला

                                   – बी बी रंजन

कई अनुत्तरित सवालों से मुक्ति, घोषणाओं की विफलता, पदलोलुप शिफ्टिंग प्रकृति और महंगी चुनावी प्रक्रिया में फिट बैठने की जुगत थी मानव श्रृंखला? अपनी घोषणाओं पर विफल नीतीश का ग्राफ तेजी से गिरा है, इसलिए मानव श्रृंखला नाकामियों को ढंकने की कोशिश भी है, विफलता की चर्चाओं और सवालों को हरियाली से ढांकने की कवायद भी है। हरियाली और दहेजबंदी बड़ा सकारात्मक मिशन है, लेकिन विफलता को छिपाने, चुनावी खर्च निकालने, सुर्खियां बटोरने को फिजूलखर्ची और पुरानी यादें नकारात्मक अंदेशा को मजबूती देते हैं। विकल्पहीनता का माहौल है, जातीय गोलबंदी का आलम है, जनता चुनावी उन्माद की दीवानी है, मार्केटिंग और ब्रांडिंग से नरेटिव बनाई जाती है, इसलिए घोषणाओं पर विफल होती सरकारें सुरक्षित हैं। भाजपा के बड़े चुनावी खर्चों से जदयू को निबटना है। दरअसल हरियाली योजना कमाई का बड़ा जरिया है, भागीदार कई हैं, इसलिए मिशन पर सवाल लाजिमी है। दरअसल अभी तक मानव श्रृंखला का कार्यक्रम मनोरंजन, अपव्यय और सुर्खियों की भेंट चढ़ता रहा है। सकारात्मक परिणाम अपेक्षित है।

हरियाली की योजना जमीन पर उतर पाए तो अच्छी बात है, लेकिन पिछली बार एक रुपए के पौधों की पन्द्रह रूपए बिलिंग, मिट्टी और कम्पोस्ट भराई की मात्रा और दर में भारी हेरफेर, ग्लो साइनबोर्ड की मनमानी कीमत से हर कोई वाकिफ है तो सत्ता शीर्ष अनजान कैसे हो सकता है।

पटना या अन्य क्षेत्रों में स्थित पार्कों के रखरखाव और सौंदर्यीकरण पर अफलातून खर्च तो ठीक है, लेकिन इसकी हालत में सुधार संशयात्मक है। सर्वप्रथम मंत्रियों और सत्ताधारियों के अघोषित एनजीओ को पार्क आवंटित किए गए और उन्हें वार्षिक आमदनी का रोजगार दिया गया।

भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस को अपना मिशन बता रहे सुशासन बाबू ने इसकी चर्चा बन्द कर दी है। इस बड़ी विफलता पर घिरते मुख्यमंत्री को मानव श्रृंखला कुछ राहत देता है। आज प्रदेश में हर संचिका के नीचे पैसा रखना पड़ता है, वरना उसमें गति नहीं आती। आपराधिक वारदातों की बड़ी फेहरिस्त के साथ अपराध पर ज़ीरो टॉलरेंस का दावा रोज चकनाचूर होता है। दहेजबंदी को लेकर आयोजित मानव श्रृंखला धराशाई कानून को लेकर उठते तीखे सवालों से राहत देता है।

नारी सशक्तिकरण का दावा रोजाना महिलाओं और बालिकाओं के साथ दुष्कर्म और गैंग रेप की बेखौफ वारदातों के साथ ढहता है। शेल्टर होम्स की घटना और कद्दावर राजनेताओं को नारियों के उपभोग की खुली छूट की शर्मनाक घटना सार्वजनिक हो चुकी है। भाजपा, लोजपा, जदयू की एनडीए सरकार की चुप्पी कायम रही है। हरियाली की हुंकार महिलाओं की चीत्कार को दबाती है और सरकार सफलता का मौखिक परचम लहराती है।

मानव तस्करी की घटनाएं आम हो चली हैं। हत्या, लूट और फिरौती की घटनाओं से कानून का राज ढह चुका है। एफआईआर का रेट निर्धारित है। अपराधियों के खिलाफ जातीय और धार्मिक भेदभाव के अनगिनत उदाहरण हैं। सरकार की निष्क्रियता को दहेजबंदी के नाम पर आयोजित मानव श्रृंखला से ढंकना है।

सड़कें जर्जर हैं, नालियां जीर्णशीर्ण हैं, आजादी के पूर्व निर्मित सीवरेज से शहरवासी परेशान हैं, गंदगी और बीमारियों पर निरंतर सरकारी लापरवाही है और पीने के पानी को लेकर हाहाकार है। प्रदूषण दिल्ली को मात देकर अव्वल आने लगा है। इन तमाम बुनियादी मसलों पर सरकार नाकाम है। हरियाली के बैनर तले आयोजित मानव श्रृंखला से इन बुनियादी सवालों को पाटना है।

बेकारी की समस्या बढ़ती जा रही है, सरकारी अस्पताल ख़ास्ता हाल है और लोग पूरी तरह निजी अस्पतालों पर आश्रित हैं। अस्पतालों में दवाइयां नहीं हैं, बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। मेडिकल कॉलेजों में बॉडी नहीं है, शिक्षक नहीं हैं, अपैरेटस और उपकरण नहीं हैं। इंजीनियरिंग कॉलेजों में आधारभूत संरचनाओं और शिक्षकों की कमी है। बिहार में इंजीयरिंग और मेडिकल कॉलेजों की स्थिति बिगड़ती गई और कोई भी स्तरीय संस्थान नहीं बन पाया। यह शिक्षा के प्रति सरकार की उदासीनता है। शिक्षा का अल्प बजट भी सरकार को अनुत्तरित करता है। पांच वर्षों में अरविंद केजरीवाल ने निजी विद्यालयों को सरकारी विद्यालयों की संरचनाओं और ग्रेडिंग से पछाड़ दिया है, लेकिन पन्द्रह वर्षों की सुशासन की सरकार ने अनपढ़ और अनाड़ियों को गुरुजी घोषित कर सरकारी शिक्षा को पूरी तरह चौपट कर दिया। मानव श्रृंखला इन सभी दागों को धोने में सफल तो नहीं हो सकती, लेकिन इनकी चर्चाओं पर अल्पविराम की कवायद है।

बेकारी का आलम यह है कि लगभग सभी नौकरियां अनुबंधित हो गईं और मामूली वेतन पर कार्यरत लोग कठिन बेतहाशा महंगाई व अवमूल्यन के दौर में जिंदगी बसर करने को विवश हो गए। बिहार में कल कारखानों की स्थापना दिवा स्वप्न रहा। व्यापारिक माहौल नहीं रहे और कार्यालयों में अफसरशाही कायम रही। हरियाली की मिशन इन बुनियादी सवालों से राहत दे सकता है।

किसान के लिए अनगिनत अच्छी योजनाएं हैं, लेकिन उनका सीमित प्रयोग इंस्पेक्टर राज की याद कराता है। किसानों के हिस्से की अधिकांश राशि अधिकारी और बिचौलिए खा जाते हैं। मंत्रालय इससे भलीभांति अवगत है। हरियाली बुनियादी सुविधाओ पर उठते तमाम सवालों से क्षणिक राहत देता है।

पदलोलुपता और सत्तामोह में बदलते अनैतिक गठबंधन से सुशासन बाबू की छवि को भारी नुकसान हुआ है। उनका ग्राफ तेजी से गिरा है। हरियाली शायद लोगों की ध्यान बांटने में कुछ सफल हो जाए।

सुशासन बाबू की इस कोशिश को सफल बनाने के लिए सरकारी मशीनरी को सक्रिय किया गया। अधिकारियों, कर्मियों, छात्र और छात्राओं को कतारों में जबरन खड़ा होना पड़ा। कार्यकर्ताओं को अपनी शक्ल दिखाने की बेबसी आ गई, नेताओं को आलाकमान के निर्देश पर पंक्तिबद्ध होना पड़ा। अन्यथा यह स्वतःस्फूर्त श्रृंखला नहीं थी।  बड़ी मशक्कत और धमकियों के साथ सरकार ने इसे आवश्यक करार दिया था।

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