राजनीति

नरेंद्र मोदी: दिल्ली में बेबस भाजपाइयों के चुनावी चेहरा

                            * बी बी रंजन

पांच वर्षों की सत्ता के बाद भी लोकसभा चुनाव में बालाकोट-पुलवामा के नाम पर वोट मांगने को विवश नरेंद्र मोदी इस बार दिल्ली चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों और जेएनयू की जद्दोजेहद के बूते जीत चाहते हैं। उन्हें अपने कार्यों पर वोट मांगते केजरीवाल से दिल्ली छीनने की बेचैनी है अन्यथा कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरेगा, बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्ष बड़ी ताकत होगा इसके छींटे बंगाल – असम चुनाव पर पड़ेंगे।

1993 और 2013 को छोड़कर दिल्ली विधानसभा के सभी चुनावों में लगातार पिछड़ती भाजपा को नमो के नाम पर चुनाव में जाने की विवशता है। नमो के चेहरे के बावजूद आप जीत गई तो केजरीवाल को नमो का विकल्प माना जाएगा, उनकी सर्वाधिक लोकप्रियता का संदेश बनेगा और असम, बिहार एवं बंगाल चुनाव में विपक्ष ताकतवर दिखेगा। दिल्ली में हर्षवर्धन, विजय गोयल या मनोज तिवारी को चेहरा घोषित कर केजरीवाल को वाक ओवर देना अनुचित होगा।

हर्षवर्धन को चेहरा घोषित करने पर वैश्य एवम् सिख मतदाताओं की गोलबंदी तो होगी, लेकिन पूर्वोत्तर भारत के मतदाताओं को पूरी तरह आम आदमी पार्टी की ओर शिफ्ट करने का खतरा है। मनोज तिवारी पूर्वोत्तर भारत के मतदाताओं पर पूरी पकड़ नहीं रखते और असम के लोगों से उनका जुड़ाव नहीं है। अलबत्ता उनके नाम पर मुहर सिख, वैश्य और जाट मतदाताओं को बिखेर सकती है। उन्हें प्रेस को फेस करने में भी परेशानी होती है। दो निर्णय आप को क्लीन स्वीप दे सकते हैं।

पूर्वोत्तर भारत के प्रवासी भारतीयों के बीच भी केजरीवाल की बड़ी लोकप्रियता है। इसलिए कभी किरण बेदी, हर्षवर्धन, विजय कुमार मल्होत्रा, सुषमा स्वराज, मदन लाल खुराना आदि नेताओं के चेहरे पर चुनाव लड़ चुकी भाजपा इस बार दिल्ली विधानसभा का चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ने को विवश है।

बिहार को छोड़कर अन्य प्रदेशों में नमो के चेहरे पर चुनाव लड़ती भाजपा को फतह मिली है, लेकिन घोषित चेहरों के बूते प्रचार करते नमो और शाह हतप्रभ होते रहे हैं। भाजपा दिसंबर 2013 में 32 सीट जीत कर दिल्ली की सबसे बड़ी पार्टी बनी और उसके ठीक बाद महज तीन सीटों पर सिमट गई। अलबत्ता नमो के चेहरे पर सम्पन्न लोकसभा चुनाव में भाजपा दिल्ली की 65 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी। इसलिए नमो के चेहरा पर उसे दुबारा भरोसा है।

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