राजनीति

जाति-आधारित चुनाव अभियान से पाटलिपुत्र हारता है राजद

चुनाव अभियान के दौरान भूमिहारों से परहेज रखता राजद हर बार पाटलिपुत्र से पराजित होता है। क्षेत्र की समस्याओं से बेफिक्र मीसा को साबित करना होगा कि वह भी एक जनप्रतिनिधि हैं। उनकी शिथिल और सीमित गतिविधियों से लोग उनका प्रतिनिधित्व भूल गए हैं। सीमित लोगों तक उनका संपर्क हो सकता है, लेकिन प्रतिनिधि होने की व्यापकता पूर्णतः गायब है। वहम और अहम का मिश्रण मीसा की दूसरी हार का कारण, अन्यथा भूमिहारों के गाँवों का महज एक दौरा परिणाम बदल सकता था।

आम लोगों को महसूस नहीं होता कि पटना या पाटलिपुत्र क्षेत्र से मीसा भारती नामक एक सांसद भी हैं। गिने-चुने विरले लोगों या कार्यकर्ताओं से चाहे उनका जो भी संपर्क रहा हो, लेकिन जनमानस में मीसा का नाम एक राजनेता के रूप में नहीं चलता। उनका कोई कार्य इन क्षेत्रों में नहीं दिखता, उनका जनसंपर्क नहीं दिखता, सदन के अंदर या बाहर जनहित से जुड़े उनके सवाल सुनाई नहीं पड़ते। कभी ससुराल और फिर मैके के मसलों पर रुक-रुककर खबर बनतीं मीसा जनता की समस्याओं पर कभी सदन के अंदर या बाहर मुखर नहीं दिखीं। अलबत्ता उनकी महत्वाकांक्षा की खबरें आतीं रहीं हैं, तामस भरे बयान सुर्खियों में रहे हैं, लेकिन उपलब्धियों की चर्चा सिफर रही है।

जनता के बीच एक प्रतिनिधि के रूप में उनकी चर्चा नहीं होती। लोगों की मानें तो चुनाव में वह लालू की राजकुमारी की तरह आतीं हैं। उनका प्रचार भी जाति-आधातित होता है। मतदाताओं के बड़े धरे को उन्होंने जातीय आधार पर कभी स्पर्श करने की जरूरत नहीं समझी। पाटलिपुत्र से यह उनकी हार का बड़ा कारण रहा है।

बहरहाल उनकी व्यस्तता निजी मामलों और पारिवारिक कलह को सुलझाने में बढ़ी है। निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और लालू के असली राजनीतिक वारिश का मसला भी चल रहा है, लेकिन मीसा कभी जनप्रतिनिधि नहीं दिखीं। अलबत्ता उन्हें लालू की बेटी भर कहा जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *