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जातिवादी अस्मिता के नाम पर अराजकता का चलन: बी बी रंजन

रानी लक्ष्मी बाई और कुंवर सिंह स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स के तहत अपनी छिनती जमींदारी की रक्षा के लिए हथियार उठाना उनकी विवशता थी। वह निजी कारण था, लेकिन तत्कालीन कवियों ने देशवासियों में जोश भरने के लिए उन्हें देशभक्ति के रंग में रंग दिया था। आज इतिहास उन्हें स्वतंत्रस्ता सेनानी नहीं मानता।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के बैनर तले संघर्षरत भारत की सबसे कुशाग्र बुद्धि और देश को समर्पित सेनानी अर्थात शहीद भगत सिंह के आगे देश नतमस्तक है, लेकिन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नेतृत्व शहीद चंद्रशेखर आजाद ने किया था, जो कभी अंग्रेजों की गिफ्फत में नहीं आये।
देवी लाल की किसान रैली से घबराए विश्वनाथ प्रताप ने अपनी राजनैतिक स्थिरता के लिए मंडल कमीशन को लागू किया, लेकिन लालू प्रसाद हीरो हो गए। उन दिनों आरक्षण विरोधी मुहिम भूमिहार और कायस्थ जाति के छात्रों के हाथों में था। इण्डिया टुडे की रपट में साफ लिखा गया कि दिल्ली में भी आरक्षण विरोधी मुहिम के 19 छात्र नेताओं में 17 बिहार के भूमिहार जति के है और 2 कायस्थ जाति के। मुम्बई में आरक्षण विरोधी मुहिम के नेतृत्वकर्ताओं में बिहार के 5 भूमिहार जाति के छात्र शामिल थे।
लालू प्रसाद के पक्ष में उधमकूद मचानेवालो को हुल्लड़बाज कहा गया और कार्रवाई हुई। राम रहीम के उपद्रवियों पर कार्रवाई हुई, मुखियाजी के दाह-संस्कार में मची अफरा-तफरी पर कार्रवाई हुई, तो करणी सेना के बबाल का विरोध क्यों न हो।
बात आरक्षण और जाति विशेष की नहीं है, लेकिन जातिगत भावना को जगाकर अराजकतावादी ताकतों का समर्थन करना न तो देशहित में है, न जनहित में। अपमी जातिवालों का भावनात्मक दोहन कर नेता बनने की खतरनाक प्रवृति का विरोध जरुरी है, तिरस्कार जायज है। अराजक लोग चाहे किसी जाति के हों।

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