राजनीति

जदयू के खिलाफ भाजपा की मुहिम अचानक थमी क्यों

विभिन्न राज्यों में पराजय के बाद नीतीश कुमार के समक्ष हताश अमित शाह के साष्टांग समर्पण से सिंगल कास्ट पॉलिटिक्स के भविष्य जकड़ गए हैं। नीतीश को विरोध की धुरी मानकर जारी ब्रह्मर्षि आंदोलन भी सिमटता दिखेगा। आंदोलन के अघोषित संयोजक अनंत सिंह भाजपा के इस निर्णय से हताश हैं। अघोषित समर्थन के लिए चर्चित भाजपा ने अपना स्टैंड बदल लिया है, राजद निराश हो चुका है। मांझी, कुशवाहा और मुकेश भी प्रासंगिक नहीं रहे: बी बी रंजन

ब्रह्मर्षि आंदोलन को भाजपा से अंदरुनी समर्थन की चर्चा रही है। उन दिनों भाजपा बिहार में नीतीश कुमार को दरकिनार कर अपने बूते सरकार बनाने का स्वप्न पाल चुकी थी। इस स्वप्न का आधार जदयू से सवर्ण मतों का बिखराव था। राजद भी सवर्ण मतों का मुंहताज है। ब्रह्मर्षि आंदोलनों के पीछे उसके मौन समर्थन की चर्चा भी चलती रही है।

नीतीश की जरूरत महसूस होते ही भाजपा ने इस मुहिम से अपना हाथ खींच लिया है। भाजपा, जदयू और लोजपा का गठबंधन मूर्त रूप ले चुका है। उसके सारे अघोषित प्रवक्ता मौन हो गए हैं। राजद भी मायूस हो चला है तो हर हाल में नीतीश कुमार को उखाड़ फेकने को आमादा अनंत की बिसात ही क्या है। ब्रह्मर्षि आंदोलन का मुख्य मुद्दा छीन गया है। ब्रम्हर्षि तो भाजपा के दीवाने हैं।

एनडीए और महागठबंधन की अदला बदली करते मुकेश सहनी, उपेन्द्र कुशवाहा और मांझी भी अप्रासंगिक हो चले हैं। उनकी मंशा भी एनडीए के साथ जुड़ने की रही है, लेकिन वहां एक बार फिर टिकट की रस्साकस्सी और उपेक्षा के हालात बन गए हैं।

ठोस गठबंधन जीत की सर्वाधिक संभावना रखते हैं। झारखंड में जेएमएम और कांग्रेस ने गठबंधन से बाबू लाल को दरकिनार कर दिया था। बिहार राजद, कांग्रेस और जदयू को बड़ी जीत मिली थी। राजद इसका सकारात्मक असर देख चुका है। बिहार में उसे कांग्रेस और रालोसपा की जरूरत है। मांझी, मुकेश और ब्रह्मर्षि आंदोलनों के नायक दोनों गठबंधनों के बीच झुलते मिलेंगे।

मांझी और कुशवाहा एनडीए की ओर मतों की गोलबंदी में विफल रहे थे। महागठबंधन में भी उनकी नकारा भूमिका रही है। मुकेश और मांझी ज्यादा मापतौल नहीं कर पाएंगे। लोकसभा चुनाव में कई सीटें बेचने को मिल गईं थीं, कुछ सीटें कांग्रेस व वाम को पछाड़ने और भाजपा को मदद पहुंचाने की नीयत से गड़बड़ हुईं थीं। विधानसभा में वैसा नहीं चलेगा।

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