गरीब महादलितों, पिछड़ों और सवर्णों को आरक्षण की जरूरत: मंजूषा

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गरीब महादलितों, पिछड़ों और सवर्णों को आरक्षण की जरूरत:  मंजूषा

MANJUSHA RANJAN

आज अगड़ी जाति समाप्त हो गयी है, अगड़ा वर्ग पैदा हो गया

जब तक गरीबी, पिछड़ापन और जातीयता है तब तक गैरविकासवादी नेताओं की राजनीति है

           लॉलीपॉप और समाचारपत्रों में बेकार की घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। हम बच्चों की पढ़ाई के लिये जमीन बेचने को विवश हैं। जमीन का मूल्य नहीं मिलता। हम बेटी की शादी में खलिहान बेचने को विवश हैं। खरीददार नहीं मिलता। हम दुनियाँ को अनाज देते हैं। अनाज का उचित दाम नहीं मिलता। कोरा आश्वासन हमें स्वाभिमान से जीने की आजादी नहीं देता। किसानों को देश में जीने की वास्तविक आजादी नहीं मिली है, क्योंकि देश के स्वार्थी जातिवादी नेताओं ने जातीय विद्वेष का जहर घोल दिया है, धार्मिक कटुता पैदा कर दी है। हमें आस्तीन के साँप ने डँस लिया है।
दलों में जाति के आधार पर टिकट मिलतेे हैं। मंत्रालय में प्रतिभा की जगह जाति को तवज्जो दी जाती है। विधानसभा चुनाव में एक जाति विशेष को टारगेट कर हवा बनायी जाती है।
आज हम कार्यानन्द शर्मा कोे भूल गये। हम राजकुमार शुक्ला के सत्याग्रह और चन्द्रशेखर आजाद की शहादत को भूल गये। शहीद भगत सिंह की कुर्बानी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गयी। श्रीकृष्ण बाबू के दलित उद्धार को हड़प लिया गया। स्वामी सहजानन्द सरस्वती की जमीन्दारी उन्मूलन को विस्मृत कर दिया गया। सरगणेशदत्त की दलित दानशीलता को विस्मृत कर दिया गया। विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंडल आरक्षण को झटक लिया गया। हमारे कुछ जयचन्दों ने हमारी कीमत पर इन छली नेताओं की चाटुकारिता प्रारम्भ कर दी। दलित करोड़पतियों ने गरीब दलितों का शोषण किया, करोड़पति पिछड़े नेताओं ने पिछड़ों का दमन किया। छद्म न्याय से छली नेताओं की किस्मत खुली।
किसानों की एकजुटता से गैरविकासवादी नेताओं को बुखार आता है। स्वाभिमान की पुट स्थापित करनेवाले एक महान् किसान नेता की हत्या कर दी जाती है। हम अनाथ हो जाते हैं। उसे छीन लिया गया जिसने हमें जीना सिखाया। मामले की तह तक जाने से परहेज की चर्चा है। आज हमारे बीच से आनेवाले मुखर लोगों को राजनीति में हासिये पर रखने का कुचक्र जारी है। तेज—तर्रार नेताओं से छली राजनीतिज्ञों को कँपकँपी आती है। हमारे स्वार्थी ‘येस बॉस’ टाइप नेताओं की चाटुकारिता से हमारी स्थिति बिगड़ी है। गरीब को आरक्षण की जरूरत है। सवर्ण आयोग की सिफारिश ठंढे बस्ते में है। संयुक्त परिवार की औसत भूमि की रिपोर्ट हृदयविदारक है। लेकिन हम अगड़ा हैं। कई करोड़पति जातीय आधार पर अब भी पिछड़ा हैं, महादलित हैं। जब तक गरीबी, पिछड़ापन और जातीयता है तब तक गैरविकासवादी नेताओं की राजनीति है।
महादलितों और सवर्णों को लड़ाने का कुचक्र चलाया गया। बीच के लोग मामले को गंभीर कर इसका लाभ लेते रहे। महादलितों और सवर्णों की सूझबूझ सेे सौहार्दपूर्ण वातावरण बना। दरअसल महादलितों और सवर्णों का रिस्ता बेहतर रहा है और देश के बेहतर विकास के लिये यह आवश्यक भी है। गरीब महादलितों, गरीब पिछड़ों और गरीब सवर्णों को आरक्षण की जरूरत है। आज अगड़ी जाति समाप्त हो गयी है। अगड़ा वर्ग पैदा हो गया है। सवर्ण आयोग की सिफारिश के अनुरूप महज दस प्रतिशत आरक्षण से बात नहीं बनेगी। सवर्णों को अठारह प्रतिशत आरक्षण चाहिये।

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