केपीएस गिल कि बातें चरितार्थ

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इस देश में देश-विरोधियों की ज्यादा कदर होती हैं

और देशभक्तों को फटकार मिलती है: केपीएस गिल 


अब बवंडर थम गया है और दिल्ली व तमिलनाडु की सरकारें स्थिर हो गई हैं। विवाद वाले मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गए हैं। अरविंद केजरीवाल ने अस्पतालों का दौरा किया और कई साल बाद जनता दरबार लगाया।

कपिल मिश्रा ने केजरीवाल को मनमोहन सिंह बना दिया है। केजरीवाल ने बिल्कुल चुप्पी साध रखी है। कपिल मिश्रा पार्टी से अलग हो गए हैं और बाकी नेता चुप हो गए हैं। पार्टी के अंदर चल रहा घमासान भी थम गया है।

आप के सुत्रों का कहना है कि लाभ के पद मामले में आप के 21 विधायकों पर चुनाव आयोग का फैसला और बवाना विधानसभा सीट पर उपचुनाव के नतीजा कि प्रतीक्षा है। आप छोड़ कर भाजपा में गए वेद प्रकाश की जीत से आप में भगगड़ मचेगी। कई नेता यह भी मान रहे हैं कि भाजपा अब आप को हल्के में ले रही है और ज्यादा आक्रामक नहीं है।

कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव की वजह से भाजपा तमिलनाडु में शांत पड़ गई है, जिससे अन्ना डीएमके और जेल में बंद शशिकला को अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिला है। करीब डेढ़ दर्जन विधायक के वापस लौटने की सूचना है। माना जा रहा है कि अन्ना डीएमके में टूट फूट का मामला ठंडे बस्ते में चला गया है।


दिल्ली में 9 सितंबर 2006 को कृष्ण काक और राधा राजन की पुस्तक ‘एनजीओज, एक्टिविस्ट्स एंड फॉरेन फंड्स’ का विमोचन में मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था और कार्यक्रम की अध्यक्षता असम-मेघालय कैडर के आईपीएस. के.पी.एस. गिल ने की थी। तब मुख्यमंत्री मोदी का वह दिल्ली में पहला सार्वजनिक, बौद्धिक कार्यक्रम था, इसलिए सभास्थल उत्सुक श्रोताओं से खचाखच भरा था। उस सभा में केपीएस गिल ने सर्वाधिक अपीलिंग वाक्य कहा था,  ‘‘इस देश में देश-विरोधियों की ज्यादा कदर होती हैं और देशभक्तों को फटकार मिलती है।’’

3 जून 2017 को दिल्ली में के.पी.एस. गिल की भोग-श्रद्धांजलि थी, लेकिन एक भी केंद्रीय कर्णधार उपस्थित नहीं था! गिल साहब की दो मोर्चों पर और दो बार राष्ट्रीय अखंडता बचाने में बड़ी भूमिका थी, लेकिन मौके पर महज मुख्यमंत्री श्रीअमरिन्दर सिंह मौजूद थे।

ग्यारह वर्ष पहले उसी सभा में गिल ने कहा था, ‘‘यह दुनिया में बेमिसाल है, कि जिस पुलिस बल को आतंकवाद पर जीत के बाद प्रशंसा मिलनी चाहिए थी, उसे बुरी तरह बदनाम किया गया। उन की जीत को झुठलाया गया।’’

सन 1993 में पंजाब से आंतकवाद को पूरी तरह खत्म करनेवाले गिल के अनुभवों और ज्ञान से सीख ली जाती तो आज जम्मू-कश्मीर समस्या नहीं होता।

केपीएस गिल ने अपनी पुस्तक ‘पंजाबः द नाइट्स ऑफ फाल्सहुड’ (1997) में आतंकवाद का संपूर्ण विश्लेषण किया था। 

उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में 26 वर्षों तक काम किया। वे अफसर थे। उस दौरान संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत तथा वहाँ आए बदलाव को निकट से देखा।

असम में पनपा उग्रवाद मूलतः पाकिस्तानी-बंगलादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ के विरुद्ध था। घुसपैठियों ने धीरे-धीरे असम में अनेकों गाँवों  में कब्जा जमा लिया। मूल निवासियों डराकर, अपमानित कर भगा दिया। गाँव के नाम बदल दिए गए। पहले के कई गाँवों का लोप हो गया और आज असम में पूर्वी पाकिस्तान-बंगलादेश के मुस्लिमों कि आब्दी तीस प्रतिशत से अधिक हो गयी।

सन् 1964 से 1979 तक का आकलन करें तो पूर्वी पाकिस्तान के साथ भारत की सीमा पंद्रह किलोमीटर अंदर खिसक आई है। घुसपैठ के जरिये पूर्वी पाकिस्तान-बंगलादेश ने सैकड़ों एकड़ जमीन दखल कर ली और भारी सेना और संसाधन युक्त भारत अपनी भूमि खोता चला गया! मत के भूखे नेताओं ने असम में इन घुसपैठियों को बसने, जमने और ताकतवर होने कि छूट दे दी।

बंगलादेश में रहने वाले हिन्दुओं की दुर्दशा का वर्णन करनेवाली तसलीमा नसरीन भारत के सेक्यूलर बौद्धिकों के लिए अछूत हो गईं। 

के.पी.एस. गिल के अनुसार बंगलादेश का हिन्दू ‘‘दुनिया का सबसे बदकिस्मत व्यक्ति है। वहाँ न उसकी संपत्ति सुरक्षित है, न उसके पत्नी सुरक्षित है और न उसे अपने धर्म के अनुसार पूजा करने कि इजाजत है। मिश्र में हिन्दुओ को घर के अन्दर पूजा करने कि इजाजत है, लेकिन मंदिर बनाने कि छूट नहीं है, सार्वजनकि स्थलों पर पूजा करने कि इजाजत नहीं है। 

भारतीय शासकों आतंकवाद, अपराध या राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर भी मतों कि राजनीति सूझती है। सपरमाणु हथियार, दूरगामी मिसाइलें और अरबों-खरबों के सैन्य-सामान से युक्त भारत एक मामूली हत्यारा, अपराधी सरगना या देशद्रोही से निपटने में संकोच करता है।

हमारी समस्याएं पिछले सौ साल की गड़बड़ी और लापरवाही की देन हैं। पंजाब के आतंकवाद को निर्मूल करने के लिए गिल को कोई राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिला, लेकिन पंजाब पुलिस मानवाधिकार उल्लंघन का मुकदमा झेल चुकी। 

गिल की समझ और अनुभव आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद से निपटने में कारगर होते, उनकी सोच प्रशासनिक सुधार के क्षेत्र में कारगर होते, लेकिन हम कृत्रिम महापुरुष बनाते हैं, उनकी पूजा करते हैं, कराते हैं और सच्चे सपूतों की बलि चढ़कर भी उन्हें याद नहीं रखते, उनसे सबक नहीं लेते।


भारत में 1977 जैसे एकाध अपवाद को छोड़ दें तो तीसरा मोर्चा हमेशा रहा है। भाजपा के खिलाफ एक महागठबंधन की संभावना बहुत कम है। तीसरा मोर्चा रहेगा।

महागठबंधन बनाने के लिए सबसे ज्यादा सक्रिय सीपीएम के नेता हैं। लेकिन सीपीएम ममता बनर्जी के साथ राजनीति नहीं कर सकती, अलबत्ता संसद में किसी मसले पर या राष्ट्रपति चुनाव में एक साथ वोट या ज्ञापन दे सकती है। 

सपा और बसपा के साथ आने की संभावना कमजोर है, क्योंकि मायावती महज राज्यसभा में प्रवेश चाहतीं हैं। गठबंधन कि स्थिति में उनके प्रत्याशी कम होंगे और परिणामी चंदा भी काफी कम हो जायेगा।

दिल्ली की आम आदमी पार्टी को मोर्चे में आने की कोई संभावना नहीं है। ओड़िशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल और तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्ना डीएमके भी अलग ही रहेंगे। इसलिए तीसरा मोर्चा रहेगा। तृणमूल-कांग्रेस के बीच तालमेल कि स्थिति में लेफ्ट, आप, बसपा, बीजद आदि का गठबंधन होगा, लेकिन कांग्रेस-लेफ्ट कि जुगलबंदी कि स्थिति में ममता, केजरीवाल, माया और नवीन की चौकड़ी जमेगी।

नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी कि पराजय और भाजपा कि जीत के बाद अचानक किरण बेदी की सक्रियता बढ़ गई है। पुड्डुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी और कांग्रेसी मुख्यमंत्री वी नारायणसामी के बीच जारी टकराव काफी बढ़ गया है को निर्देश दे रही हैं और सबसे ऊपर यह कि इसका पूरा प्रचार कर रही हैं। किरण बेदी लोगों से मिल रही हैं, उनकी समस्याएं सुन रही हैं, अधिकारियों को निर्देश दे रही हैं, साइकिल यात्रा कर रही हैं, राज्य में मुख्यमंत्री की तरह काम कर रही हैं और हजारों मील दूर स्थित दिल्ली के लोगों के बीच इसका पूरा प्रचार कर रहीं हैं। 

दिल्ली में भाजपा कवर करने वाले या दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय उनके संपर्क में आए पत्रकारों को किरण बेदी के कामकाज का पूरा ब्योरा व्हाट्सएप्प पर मिल रहा है। पूरी दिनचर्या दिल्ली के लोगों को बताया जा रहा है। 

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