राजनीति

केंद्र को सबक, प्रदेश नेतृत्व को सीख

– बी बी रंजन

अब बड़ी सलीखे से सारा ठीकरा तो रघुवर के सिर फूटेगा, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में 370 और 35 ए नकारा हुआ तो झारखण्ड में राममंदिर और एनआरसी बेअसर रहा। रघुवर के कारनामों और शाह-मोदी की घबराहट में झारखण्ड लूज करने की आहट थी, क्योंकि खाली सभा में आक्रोशित शाह ने पूछा था कि इतनी कम भीड़ से चुनाव कैसे जीतोगे।  पिछली बार 37 सीटों पर काबिज भाजपा इस बार 65 सीटों पर फतह का आकलन कर रही थी, लेकिन महज 25 सीटों पर लुढ़ककर विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी भी नहीं रह पाई।

तीन राज्यों के हालिया चुनाव ने केंद्र को संदेश दिया है कि हर बार हिंसक लकीरों से जीतना नहीं निकलती। सत्ता का सर्वस्व लाभ सिर्फ वैश्य समाज को मिलने की देने को धारणा कोर सवर्ण वोटर को नाराज कर गया। यादव मतदाताओं को पटाने की नीयत से सवर्णों हाशिए पर लाने की कवायद भूमिहारों को नाराज किया। अमित शाह की रैलियों में भीड़ नहीं जुटी, इसलिए नमो की रैलियों की संख्या बढ़ाई गई थी, लेकिन झारखंड का परिणाम भाजपा को सबक दे गई कि कोर वोटरों की अनदेखी के खतरनाक परिणाम होंगे।

आदिवासी मुख्यमंत्री, टिनेंसी एक्ट में संशोधन, मुख्यमंत्री का तानाशाही व जातिवादी रवैया, सीएम के दावेदारों के टिकट कटवाने की रघुवर की नीति, आगंतुकों को प्रत्याशी बनाने का निर्णय, महाराष्ट्र व हरियाणा में भाजपा की हार से कार्यकर्ताओं के टूटते मनोबल और केंद्र की विफल नीतियों ने भाजपा को पहले हरियाणा, महाराष्ट्र और अब झारखंड में समझाया कि कांग्रेसमुक्त भारत का लक्ष्य नामुमकिन है। लोगों को विकास,रोजगार और मजबूत आर्थिकी भी चाहिए। सत्ता को संदेश मिला कि सरयू राय जैसे नेता को दरकिनार करने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

यह परिणाम केंद्र की बेकारी, झारखंड में बन्द होती कम्पनियों से लोगों के लगातार छीनते रोजगार, देश की बदहाल आर्थिक और सुधार के निरर्थक प्रयास का विरोध भी है। इसे दूसरे दलों के आगंतुकों और बदनुमा चेहरे को प्रत्याशी बनाने की भाजपाई नीति का विरोध भी मानना होगा।

रघुवर दास की कार्यशैली और उनकी जातिवादी कार्यकलापों का सर्वाधिक विरोध हुआ है। रघुवर को अपने सहयोगियों, अधिकारियों व अपनी पार्टी के नेताओं ने बेचैन कर दिया था। उनकी छवि एक निरकुंश और बिगड़ैल मिजाज के स्वछंद नेता की रही है। उन्होंने नेताओं, अधिकारियों और सहयोगियों को खूब नाराज किया था। यह नाराजगी चुनाव में भाजपा को भारी पड़ी।

भाजपा की टिकट पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोहरदगा के निवर्तमान विधायक सुखदेव पाठक, पांकी सीट से जेएमएम की टिकट पर पिछली बार मामूली अंतर से पराजित हत्यारोपी शशिभूषण औऱ भवनाथपुर सीट से निर्दलीय विधायक भानु प्रताप शाही को उतारा गया था। आजसू के बड़े नेता सुदेश महतो की उपेक्षा से भाजपा का 20 साल पुराने सहयोगी से गठबंधन टूटा। विधानसभा चुनाव में निर्णायक साबित हुआ। रघुवर दास अपने विरोधियों और मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों का टिकट कटवाते रहे। नाराज सरयू राय ने अपनी पूर्वी सिंहभूम की सीट छोड़कर पूर्वी जमशेदपुर से सीधे मुख्यमंत्री को पटकनी दे गए। कई क्षेत्रों में भाजपा के बागियों ने ही पार्टी को नुकसान पहुंचाया।

 

महाराष्ट्र में गैरमराठा और हरियाणा में गैरजाट को मुख्यमंत्री का ताज उल्टा पड़ा, जबकि झारखंड में भी गैरआदिवासी मुख्यमंत्री की नियुक्ति आदिवासियों को नाराज कर गया था। रघुवर  कार्यकाल के दौरान संथाल परगना टिनेंसी एक्ट एवं छोटानागपुर टिनेंसी एक्ट में संशोधन कर जमीन पर उनके मालिकाना हक को समाप्त करने का कानून उनके बीच गहरी नाराजगी पैदा कर दी।

दूसरी ओर पिछली बार के राजद-जेएमएम के गठबंधन में इस बार काँग्रेस भी आ गई, लेकिन भाजपा की सहयोगी जदयू और लोजपा ने अलग प्रत्याशी उतार कर भाजपा को क्षति पहुंचाने की कोई कसर नहीं छोड़ी। इसका मकसद बिहार चुनाव के पूर्व भाजपा को यथासंभव कमजोर करना था

संसदीय चुनाव में कुर्मी नेता रामटहल चौधरी का टिकट भाजपा ने काट दिया था। फिर आजसू के भाजपा अलग हुई। रविन्द्र पांडेय को किनारा लगाया गया था। इस बार नीतीश कुमार ने भी अपने प्रत्याशी उतारे हैं। इससे कुर्मी मतदाता भी भाजपा से नाराज हुए।

 

भाजपा से निकले बाबूलाल मरांडी, भाजपा से अलग हुई आजसू, भाजपा की दो सहयोगी पार्टियां जनता दल यू और लोजपा भाजपा के मतों में बिखराव के लिए काफी थीं। यह दीगर बात है कि जदयू और लोजपा मिशन बिहार को लेकर झारखंड में भाजपा हराओं का मिशन चला रहे हैं।

महाराष्ट्र और हरियाणा के खराब चुनाव प्रदर्शन से झारखण्ड में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा था। अलबत्ता कांग्रेस सहित विपक्ष में नए जोश का संचार हुआ।

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