उत्तरप्रदेश : पिछड़ी जातियों की राजनीति की बिसात के बीच फिसलती सपा

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पिछड़ी जातियों की गोलबंदी पर कभी चित, कभी पट

* बी. बी. रंजन 

अपना दल की नेता और सांसद अनुप्रिया पटेल  अमित शाह वाराणसी में अपना दल के संस्थापक सोने लाल पटेल की जयंती पर आयोजित स्वाभिमान रैली में विशेष अतिथि थे और फिर अनुप्रिया पटेल को केंद्र सरकार में राज्यमंत्री बनाकर बीजेपी पूर्वांचल में कुर्मी वोटों की एकजुटता और नीतीश कुमार की कुर्मीगिरी पर विराम का प्रयास प्रारंभ कर चुकी है.
बीएसपी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य का बीएसपी छोडऩा और अनुप्रिया का केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होना उत्तर प्रदेश में गैर यादव पिछड़ी जातियों की एकजुटता के प्रयास हैं. दरअसल पिछड़ी जातियों में सवार्धिक फायदा यादव जाति को ही हुआ है. आसन्न चुनाव को देखते हुए गैर-यादव जातियां पिछड़ेपन को मुद्दा बनाकर एकजुट हो रहीं हैं औरगैर यादव पिछड़ी जातियों और यादवों के बीच विभाजन दिख रहा है. मौर्या और भाजपा के बीच नजदीकी बनाने के आसार भी हैं. 
गैर-यादव पिछड़ी जातियों में कुर्मी, सैनी, शाक्य, कुशवाहा और मौर्य की सम्मिलित हिस्सेदारी 14 फीसदी से कुछ ज्यादा है. ये सभी कृषक जातियां हैं. वाराणसी, कानपुर, लखीमपुर खीरी, फर्रुखाबाद समेत पूर्वांचल और बुंदेलखंड क्षेत्र के कुल 17 जिलों में कुर्मी बिरादरी की आबादी 15 फीसदी से ज्यादा है. सहारनपुर, मुजफ्फरनगर समेत आसपास के जिलों में सैनी और प्रतापगढ़, इलाहाबाद, देवरिया, कुशीनगर जिलों में मौर्य बिरादरी की अच्छी संख्या है
पिछड़ी जातियों में सपा सरकार की यादवपरस्ती के खिलाफ असंतोष पनप रहे हैं. इससे प्रेरित होकर भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य को यूपी बीजेपी की कमान सौंप दी.  इलाहाबाद में ‘सरदार पटेल विराट किसान सम्मेलन’ के जरिये भाजपा कुर्मी के निकट आना चाहती है. भाजपा आधा दर्जन कुर्मी नेताओं को सक्रिय कर चुकी है और उनके जरिये अन्य पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने के प्रयास हो रहे हैं.
बीएसपी के पूर्व विधायक प्रवीण पटेल और मिर्जापुर से सपा नेता रमा शंकर पटेल समेत कई कुर्मी नेताओं कोबीजेपी में शामिल करा कर अनुप्रिया पटेल को दबाव में लाया गया.  यूपी भाजपा के प्रभारी ओम प्रकाश माथुरके प्रयास से अपना दल का भाजपा में विलय कराया. गया. अनुप्रिया पटेल को पूर्वांचल में नीतीश कुमार की बढ़ती सक्रियता को कमजोर करने के लिए लगाया जायेगा.  अपना दल के कृष्णा पटेल को भी न्हाजापा में लाने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं. स्वामी प्रसाद मौर्य के करीबी बीएसपी विधायक उदय लाल मौर्य ओम माथुर समेत कई नेताओं के संपर्क में हैं.
सपा के मंत्री राममूर्ति वर्मा ने सर्वाधिक तीव्र गति से अपने राजनैतिक कद में इजाफा किया है.  सहारनपुर के साहब सिंह सैनी सैनी जाती के प्रभावशाली नेता हैं और सपा के एमएलसी और मंत्री हैं. एनआरएचएम घोटाले के आरोपी पूर्व बसपा नेता बाबू सिंह कुशवाहा इन दिनों सपा के ख़ास संपर्क में हैं. सपा के कुर्मी जाति के पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल ददुआ के भाई हैं. ददुआ का पुत्र और भतीजा सपा विधायक हैं. इनका क्षेत्र चित्रकूट है. लखीमपुर खीरी के सपा सांसद रवि वर्मा भी कुर्मी चेहरा हैं. बाराबंकी के बेनी प्रसाद वर्मा की कुर्मी नेता के रूप में सपा में वापसी हुई है.    
पिछली बार बसपा के टिकट पर जीते और वर्तमान में सीतापुर से आनेवाले भाजपा सांसद राजेश वर्मा भी कुर्मी विरादरी के हैं. उत्तरप्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और फूलपुर के सांसद केशव मौर्य की मौर्य विरादरी पर अच्छी पकड़ है. कुर्मी जाति के ही उग्र नेता विनय कटियार का हिंदूवादी प्रभाव अन्य जातियों पर भी है. बरेली के प्रभावशाली कुर्मी नेता संतोष गंगवार केंद्र में भाजपा के मंत्री हैं. भाजपा के कुर्मी नेता स्वतन्त्र सिंह देव भाजपा के सदस्यता अभियान के प्रभारी हैं. महाराजगंज के भाजपा सांसद पंकज चौधरी कुर्मी चेहरा हैं और लोकसभा में पार्टी का सचेतक बनाकर इन्हें महत्व दिया गया है.
कुशीनगर से आनेवाले कांग्रेस के आरपीएन सिंह का कुर्मी और राजपूत मतदाताओं पर समान प्रभाव है. विधायक रामप्रसाद चौधरी बसपा के कुर्मी चेहरा हैं, लेकिन बसपा के एक अन्य कुर्मी लालजी वर्मा बहरहाल पार्टी में हासिये पर हैं.
सरकारी नौकरियों और विकास योजनाओं में यादवों को ज्यादा महत्व दिया गया. कुर्मी की टूटन को रोकने के लिए मुलायम सिंह यादव ने अकबरपुर के विधायक और कुर्मी नेता राममूर्ति वर्मा को पहले राज्यमंत्री और फिर कैबिनेट मंत्री बनाया. पूर्वांचल के बड़े कुर्मी नेता बेनी प्रसाद वर्मा शिवपाल यादव की कोशिश के बाद सपा में हैं और मुलायम सिंह ने उन्हें राज्यसभा में जगह दी है.
उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह देकर पूर्वांचल के कई जिलों का प्रभारी बनाने की तैयारी है. मुलायम सिंह ने अन्य पिछड़ी जातियों में साहब सिंह सैनी को कैबिनेट मंत्री और फैजाबाद की लीलावती कुशवाहा को विधान पार्षद बनाकर अति पिछड़ी जातियों की यादव विरोधी मुहिम को रोकने की कोशिश की है. बीएसपी भी एक जाटव  नामक दलित जाति पर अधिक मेहरबान है. अन्य पिछड़ी जातियों में  बसपा की इस नीति से असंतोष है. कुर्मी नेता लालजी वर्मा भी पिछले दो वर्षों से हाशिए पर हैं. मौर्य की पार्टी से रवानगी बसपा से कुर्मी मतदाताओं को विमुख करती है. बसपा बस्ती के विधायक एवं कुर्मी नेता राम प्रसाद चौधरी का महत्व बढ़ाकर बसपा मौर्य के नुकसान को कम करना चाहती है.
लालू प्रसाद की तरह नीतीश कुमार एक प्रभावी कुर्मी नेता बनने की कोशिश में हैं. हार्दिक पटेल उन्हें परेशान करता है, लेकिन गुजरात में नरेन्द्र मोदी के विरोध में हार्दिक के चेहरा को समर्थन देना उनकी मजबूरी है.  नीतीश गाजीपुर, मिर्जापुर, लखनऊ, वाराणसी के पिंडरा जैसे कुर्मी बहुल जगहों पर रैलियां की है. नीतीश कुमार अपनी जाति की ओर से प्रधानमंत्री बनने की उठती आवाज़ को गति देना चाहते हैं. भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कुर्मी नेता ओम प्रकाश सिंह को अहमदाबाद में सरदार पटेल की बनने वाली प्रतिमा के लिए बनी लोहा संग्रहण समिति का प्रदेश प्रभारी बनाया था. लोकसभा चुनाव के बाद ओम प्रकाश सिंह हासिये पर चले गए है. नीतीश कुमार उत्तरप्रदेश के अपने भाषणों में ओमप्रकाश सिंह का जिक्र कर कुर्मी मतदाताओं का ध्यान भाजपा में हो रही कुर्मियों की उपेक्षा की ओर खींचना चाहते है. कुमार उन्हें सिम्बोलिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं. 
नीतीश मुलायम सिंह यादव पर  बिहार चुनाव में धोखा देने का आरोप लगाते हैं.  यहाँ लालू और नीतीश का अहम् टकराता है. मुलायम पर धोखेबाजी का आरोप लगाकर नीतीश उत्तरप्रदेश में पिछड़ा वोट बैंक में सेंधमारी की फिराक में हैं. नीतीश शरद यादव की मदद से स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने पाले में करना चाहते हैं. अपना दल के दूसरे धड़े की अध्यक्ष कृष्णा पटेल के साथ कुमार लगातार संपर्क बनाकर कुर्मी मतों की गोलबंदी के लिए सक्रिय हैं.

दरअसल लालू प्रसाद उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह के पक्ष में मोर्चा खोलने के पक्ष में नहीं थे. उनका मानना है की मुलायम के बिना यूपी में कोई भी भाजपा विरोधी गठबंधन कारगर साबित नहीं होगा, लेकिन सूत्रों की मानें तो नीतीश कुमार २०१९ के संसदीय चुनाव में प्रधानमन्त्री के चेहरा के रूप में अपनी निर्विवादित मान्यता की शर्त पर ही किसी दल के साथ जाना चाहते हैं. नीतीश पुरे देश में भाजपा के विरोध की राजनीति का पूरा श्रेय स्वयं लेना चाहते है. आज अपने मिशन में व्यवधान पड़ने की स्थिति में नीतीश लालू की सलाह की परवाह भी नहीं करते. प्रायः हर प्रदेश के चुनाव में अपनी असफल कोशिश के पीछे नीतीश एक ही सफल मैसेज देना चाहते हैं. उन्हें भाजपा विरोधी नेतृत्वकर्ता की छविप्राप्त करने की चिंता है. हांलाकि यूपी में नीतीश कुमार का कोई जनाधार नहीं है और पिछले चुनाव में परिणाम भी देखा जा चुका है. यूपी में कांग्रेस नीतीश की इस कमजोरी को समझ रही है और ऐसी स्थिति में वह नीतीश की नोटिस नहीं ले रही है. नीतीश के इस मुहिम को रन आउट करने के लिए केजरीवाल भी विज्ञापन वार में कूद पड़े हैं. दिल्ली के कार्यों को सम्पूर्ण देश में भुनाने की कोशिश की जा रही है. 

 
 

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